गढ़वाल भ्रातृ मंडल, मुंबई 92 सालों का गौरवशाली सफर

बांद्रा टर्मिनस, मुंबई से रामनगर उत्तराखंड जानेवाली ट्रेन के समय में मंडल के रेल्वे प्रकोष्ठ के संयोजक बाल कृष्ण शर्मा के प्रयत्नों से रूट में कटौती करके 10 घंटे की कमी की गई। यह मंडल के इतिहास में एक विशिष्ट उपलब्धि रही। साहित्य, कला, संगीत, खेल एवं समाजसेवा आदि क्षेत्र में विशिष्ट योगदान करनेवाले उत्तराखंड के मनीषियों को ‘गढ़रत्न पुरस्कार’ से सम्मानित करना ‘मंडल’ की परंपरा का हिस्सा रहा है।

मुंबई और इसके आसपास रहनेवाले उत्तराखंडियों को पिछले 91 वर्षों से एक सूत्र में बांधने का श्रेय बहुत कुछ हद तक गढ़वाल भ्रातृ मंडल, मुंबई को ही जाता है। 1928 में स्थापित उत्तराखंडियों की सबसे पुरानी व प्रतिनिधि संस्था मुंबईकर उत्तराखंडियों की चार पीढ़ियों के मध्य उत्तराखंडी संस्कृति के वाहक के रूप में कार्यरत रहते हुए सदैव उनके सांस्कृतिक, सामाजिक व शैक्षणिक विकास के लिए प्रतिबद्ध रही है।

मुंबई में हमारे पूर्वजों का आगमन रोजगार व व्यवसाय की खोज में प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के पश्चात् लगभग 1918 में हुआ था। मुंबई निवासी ’पहाड़ियों को संगठित कर उनके सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक उत्थान के लिए 28 अप्रैल 1928 को ’गढ़वाल भ्रातृ मंडल’ की स्थापना की गई। मंडल का 30 अप्रैल 1948 को सोसायटी एक्ट 1860 के तहत पंजीकरण किया गया तथा 17 दिसम्बर 1962 को इसका पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के अंतर्गत पंजीकरण किया गया। जिसका निजी कार्यालय स्थापना के समय सागर भुवन, गिरगांव में हुआ करता था। देवभूमि से आये नवयुवकों को रोजगार दिलाना व उन्हें उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करना मंडल का मुख्य सामाजिक मिशन हुआ करता था। मंडल द्वारा अपने कोष से उस समय समाज के जरूरतमंद बंधुओं को अल्प ब्याज पर स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने के लिए ऋण उपलब्ध कराया जाता था। एक समय ऐसा भी था जब मुंबई में टैक्सी व्यवसाय में हमारे लोगों का वर्चस्व था। मंडल द्वारा 1930 में पेशावर कांड के समर्थन में मुंबई में बहुत बड़े जुलूस का आयोजन कर मुंबई के सामाजिक पटल पर पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई गई। जिसमें देश के शीर्षस्थ नेता सरदार पटेल, मदन मोहन मालवीय, सरोजनी नायडू जैसे नेताओं ने भी भाग लेकर इसकी गरिमा बढ़ाई थी। 1934 में मुंबई के कांग्रेस महाअधिवेशन में मंडल द्वारा गठित गढ़वाल वालिंटियर कोर को उस कार्य-दक्षता के लिए सर्वोच्च पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। विशेष रूप से महात्मा गांधी व सरदार पटेल की कुटिया पर हमारे स्वयंसेवकों की नियुक्ति ने ’मंडल’ को गौरवान्वित किया। स्वतंत्रता संग्राम के पहले मुंबई में कई बार हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए। जिसमें हमारे हिन्दू भाइयों को भारी जान-माल की हानि उठानी पड़ी थी। इस दौरान हमारे बंधुओं द्वारा मुंबई के प्रसिद्ध मंगलदास मार्केट को लुटने से बचाकर फिर एक बार मुंबई में वाह-वाही लूटी गई।

मुंबई महानगरी में प्रथम रामलीला आयोजित करने का श्रेय हम उत्तराखंडियों को ही जाता है। सही मायने में मुंबई के विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित होनेवाली रामलीलाओं के आयोजनों द्वारा ही हमें इस महानगरी में अपनी पहचान मिली। हालांकि मंडल द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किसी भी रामलीला का आयोजन नहीं किया गया। किन्तु मंडल के कई सक्रिय कार्यकर्ता इन रामलीलाओं के आयोजक व प्रमुख भूमिकाओं में रहे।  मुंबई में उत्तराखंडीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत करने का पूर्ण श्रेय मंडल को जाता है। 1953 में पहली बार ’मंडल’ द्वारा ‘भारी भूल’ नाटक का मंचन किया गया, जिसके लेखक व निर्देशक प्रसिद्ध लोकगायक जीत सिंह नेगी थे। इस कार्यक्रम से मंडल को महानगरी में एक नई दिशा व पहचान मिली। पाकिस्तान युद्ध में विजयप्राप्त कर 30 सितंबर, 1966 को मुंबई में पोस्टिंग हुई गढ़वाल राइफल्स के जवानों का अभिनंदन ’मंडल’ द्वारा एशिया के सबसे बड़े सभागृह षण्मुखानंद सभागृह में किया गया। यह सम्मान की बात थी कि ‘फिल्म डिविजन’ द्वारा इस नागरिक अभिनंदन की न्यूजरील (डाक्यूमेंट्री) बनाई गई।

मुंबई में उत्तराखंडियों के अपने स्थाई निवास हों, इस संदर्भ में मंडल द्वारा 1960 के दशक में गढ़वाल सहकारी भवन समिति की स्थापना की गई। मुंबई के पश्चिम उपनगर जोगेश्वरी (पूर्व) में ’गढ़वाल दर्शन’ भवन का निर्माण किया गया। वर्तमान में मंडल का पंजीकृत कार्यालय इसी भवन में है। मंडल के इस कार्यालय में सुदूर उत्तराखंड से मुंबई में इलाज कराने के लिए आये मरीजों, उनके रिश्तेदारों व विभिन्न प्रतियोगिताओं में सहभागी होने आये प्रतिभागियों के साथ ही मुंबई में साक्षात्कार देने आये नवयुवकों के लिए रहने की वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है। उक्त भवन रीडेवलपमेंट की प्रक्रिया में है। मंडल का प्रयास है कि इस अवसर का लाभ उठाते हुए वर्तमान कार्यालय का विस्तार कम्युनिटी हॉल के रूप में किया जाय, जिसके लिए भविष्य में सभी का सहयोग अपेक्षित है।

1992 में गढ़वाल के उत्तरकाशी व टिहरी आदि क्षेत्रों में आये विनाशकारी भूकंप पीड़ितों के सहायतार्थ टिहरी जिले के लगभग 30 गांवों में जिन परिवारों के मकान पूर्णतः ध्वस्त या क्षतिग्रस्त हो गये थे उनके बीच लगभग 5 लाख रु. की नकद धनराशि और साथ ही राहत सामग्री व दवाइयां दो चरणों में वितरित की गई। मंडल द्वारा विवाह योग्य उत्तराखंडी युवक-युवतियों के लिए हर वर्ष परिचय सम्मेलन का आयोजन किया जाता है।

बांद्रा टर्मिनस, मुंबई से रामनगर उत्तराखंड जानेवाली ट्रेन के समय में मंडल के रेल्वे प्रकोष्ठ के संयोजक बाल कृष्ण शर्मा के प्रयत्नों से रूट में कटौती करके 10 घंटे की कमी की गई। यह मंडल के इतिहास में एक विशिष्ट उपलब्धि रही। साहित्य, कला, संगीत, खेल एवं समाजसेवा आदि क्षेत्र में विशिष्ट योगदान करनेवाले उत्तराखंड के मनीषियों को ’गढ़रत्न पुरस्कार’ से सम्मानित करना ’मंडल’ की परंपरा का हिस्सा रहा है। समाज के मेधावी व होनहार विद्यार्थियों को प्रतिवर्ष नोटबुक व लेखन सामग्री का वितरण, निर्धन विद्यार्थियों को स्कूल की फीस मुहैया कराना, उनके शैक्षणिक प्रतियोगिताओं व कैरियर मार्गदर्शन शिविर का आयोजन करना मंडल की सामाजिक प्रतिबद्धता का हिस्सा रहा है।

लातूर, उत्तरकाशी, गुजरात तथा केदारनाथ में आये विनाशकारी भूकंप से पीड़ित लोगों की आर्थिक सहायता, कारगिल निधि में योगदान, इसके अलावा राष्ट्रीय आपदा बाढ़, सूखा आदि के अवसर पर प्रधान मंत्री/मुख्य मंत्री आदि राहत कोष में मंडल द्वारा समय समय पर यथाशक्ति योगदान दिया जाता है। उत्तराखंड के विकास के संदर्भ में, पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनजागरण व उत्तराखंड के धार्मिक पर्यटन स्थलों के बारे में इच्छुक व्यक्तियों व संस्थाओं को मार्गदर्शन तथा प्रोत्साहन देना भी मंडल की गतिविधियों में प्रमुख रूप से शामिल रहा है। 27 मई 2018 को मुंबई में आयोजित ’प्रथम उत्तराखंड फिल्म अवार्ड’ के अवसर पर उत्तराखंडियों की सबसे पुरानी प्रतिष्ठित व प्रतिनिधि संस्था होने के नाते गढ़वाल भ्रातृ मंडल, मुंबई को स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया। मुंबई महानगरी में ’उत्तराखंड महोत्सव’ को आयोजित करने का सपना सर्वप्रथम मंडल द्वारा ही देखा गया था। वर्ष 2005 में इस संदर्भ में काफी तैयारियां भी की गई थी। लेकिन कुछ अपरिहार्य कारणों से यह आयोजन न हो सका। ’मंडल द्वारा जनवरी 2017 में मुंबई के पश्चिम उपनगर बोरीवली (प.) में स्थित डॉन बॉस्को हाई स्कूल के ग्राउंड में यूएफओ के साथ मिलकर, त्रिदिवसीय ’उत्तराखंड उत्सव’ का सफल आयोजन कर इस सपने को साकार किया गया। गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी, कल्पना चौहान, संगीता ढौंडियाल, जितेन्द्र टोमक्याल, रोहित चौहान, साहब सिंह रमोला आदि उत्तराखंड के प्रतिष्ठित कलाकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर इस आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया था। इस अवसर पर निकाली गई कलश-यात्रा में मंबई व निकटवर्ती ठाणे, नवी मुंबई की 50 भजन मंडलियों की लगभग 3000 उत्तराखंडी महिलाओं ने पारंपरिक परिधान में शिरकत करके मुंबई में कीर्तिमान स्थापित किया। उत्तराखंड के प्रसिद्ध चार धामों में से एक गंगोत्री से आये ग्यारह पुरोहितों ने इस उत्तराखंड उत्सव में विशेष रूप से पधार कर इसकी गरिमा बढ़ाई।

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