कोरोना से देश में बढ़ी बेरोजगारी

सामान्य तौर पर बेरोजगार उस व्यक्ति को कहा जाता है, जो बाजार में प्रचलित मजदूरी दर पर काम तो करना चाहता है लेकिन उसे काम नहीं मिल पा रहा है। बेरोजगारी की समस्या विकसित और विकासशील दोनों  देशों में पाई जाती है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कींस के अनुसार किसी भी देश में  बेरोजगारी अन्य किसी भी समस्या से बड़ी समस्या है।

कोरोना महामारी ने हमसे काफी कुछ छीन लिया। हमारे सपने, हमारे अपने, हमारी खुशियां और हजारों-लाखों लोगों की आमदनी का जरिया। हालांकि इस स्थिति से हमें काफी कुछ सीखने को भी मिला। हमने प्रकृति और परिवार का महत्व समझा,  बेफिजूल के खर्चों पर अंकुश लगाना सीखा और अपनी ’सीमित जरूरतों के दायरे’ में  रह कर जीना सीखा, पर विडंबना यह कि कोरोना महामारी से उपजे आर्थिक संकट  की वजह से हमारी सीमित जरूरतों की आपूर्ति भी दिन-ब-दिन मुश्किल होती जा रही  है। एक ओर बढ़ती वैश्विक बेराजगारी की समस्या है, तो दूसरी ओर नये रोजगार की  कमी और उस पर से सुरसा की तरह हर रोज अपना मुंह बढ़ाए जा रही मंहगाई। इन सब स्थितियों के बीच आम आदमी बेचारा पिसकर रह गया है।

पिछले तीन दशक में सबसे ज्यादा बेरोजगारी

कोरोना महामारी के प्रसार पर अंकुश के लिए पहली बार मार्च-2020 में पहली बार लॉकडाउन लगाया गया। अचानक से लगने लगा कि दुनिया थम गई है। लोग भयभीत हो उठे। बाजार में हर ओर अफरा-तफरी सी मच गई। इसी दौरान संयुक्त राष्ट्र की कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट (णछउढ-ऊ) द्वारा एक रिपोर्ट जारी की गई,  जिसके अनुसार कोरोना वायरस से प्रभावित दुनिया की 15 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत भी है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (खङज) अनुसार  2020 के दौरान भारत की बेरोजगारी दर बढ़ कर 7.11 फीसदी हो गई, जो कि पिछले तीन दशक की सबसे ज्यादा थी।

रोजगार एवं बेरोजगारी की भिन्न परिभाषा

रोजगार एवं बेरोजगारी की परिभाषा हर देश में अलग अलग होती है। जैसे- अमेरिका  में यदि किसी व्यक्ति को उसकी योग्यता के हिसाब से नौकरी नही मिलती है, तो उसे बेरोजगार माना जाता है। सामान्य तौर पर बेरोजगार उस व्यक्ति को कहा जाता है, जो बाजार में प्रचलित मजदूरी दर पर काम तो करना चाहता है लेकिन उसे काम नहीं मिल पा रहा है। बेरोजगारी की समस्या विकसित और विकासशील दोनों  देशों में पाई जाती है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कींस के अनुसार किसी भी देश में  बेरोजगारी अन्य किसी भी समस्या से बड़ी समस्या है।

देश को मिला ‘लोकल टू वोकल’ का मंत्र

कोरोना आपदा के परिणामस्वरूप उत्पन्न विकट आर्थिक स्थिति को काबू में करने  के लिए लागू लॉकडाउन के तीसरे चरण के समाप्त होने से पांच दिन पहले राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि संकट के इस दौर में ’लोकल’ ने ही हमें बचाया है। स्थानीय स्तर पर निर्मित उत्पादों ने ही आगे बढ़ने का  रास्ता दिखाया है। अत: हमें इसे ही अपने आत्मनिर्भर बनने का मंत्र बनाना चाहिए। मोदी ने स्थानीय उत्पाद के तौर पर उस वक्त खादी और हथकरघा का उदाहरण पेश किया था। साथ ही अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के लिए 20 लाख करोड़ रुपए की आर्थिक पैकेज की घोषणा करते हुए कहा था कि यह पैकेज 2020 में आत्मनिर्भर भारत को नई गति देगा। अब तक यह नारा व्यावहारिक धरातल पर कितना कारगर हुआ है, उसका विश्लेषण करने के बाद ही इस बारे में कुछ कहना मुनासिब होगा।

कारोबारियों पर पड़ी सबसे ज्यादा मार

कोरोना की आर्थिक मंदी की मार झेल रहे बनारस के लठिया गांव के प्रजापति बस्ती में रहने वाले कुम्हार रामजी प्रजापति कहते हैं, ”सरकार ने लोकल टू वोकल का नारा तो दे दिया। हमें इलेक्ट्रिक चाक की सुविधा भी उपलब्ध करवा दी लेकिन ऐसे चाक पाने वाला मैं अकेला कुम्हार नहीं हूं। हमारे इलाके में कुल दस कुम्हारों को ऐसे चाक मिले हैं। इससे हमारा उत्पादन तो बढ़ गया लेकिन अब उस उत्पादन को बेचे कहां, यह एक बड़ी समस्या है। पहले उत्पादन भले कम था, पर किसी तरह मेले-ठेले आदि के जरिए उसकी कीमत मिल जाती थी। अब तो हाल यह है कि उत्पादन अधिक है और खरीदार कम। ऐसे में हमारे लिए अपनी लागत निकाल पाना भी मुश्किल हो गया है।”

बिहार की राजधानी पटना के गोसाई टोला मुहल्ले में रहने वाली कौशल्या देवी की समस्या भी लगभग इसी प्रकार की है। कौशल्या सुजनी कढ़ाई, मधुबनी पेंटिंग, एप्लिक वर्क आदि का काम करतीं और करवाती हैं लेकिन पिछले दो सालों से मार्केट का जो हाल है, उसमें उनके बनाए उत्पादों की बिक्री न के बराबर हो गई है। कौशल्या कहती हैं, “पहले व्यक्तिगत बिक्री करने के साथ ही साल में जो दो-तीन मेले लगते थे, उसमें अच्छी-खासी बिक्री हो जाती थी, पर अब तो हाल यह है कि नया क्या बनाएं, जब पुराना ही माल नहीं निकल रहा है।”

मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले की आदिवासी संस्कृति को दर्शाती आदिवासी गुड़िया घर के मालिक सुभाष गिर्वानी कहते हैं, ”हमलोग विशेष तौर से झाबुआ की आदिवासी संस्कृति को दर्शाती गुड़िया बनाते हैं, जो लोगों को काफी पसंद आती है। इसकी लोकल बिक्री भी काफी अच्छी है। इसके अलावा राज्य स्तरीय मेलों मेंं इसकी अच्छी-खासी बिक्री होती है। हमारी पूरी लागत वहीं से निकल जाती है। अभी लॉकडाउन में सब कुछ ठप्प पड़ा है। आधे से ज्यादा माल भी नहीं निकल पाया है, पर हम सिवाय सरकार से जल्द ही इस स्थिति को सुधारने का अनुरोध करने के अलावा कर भी क्या सकते हैं।

इस तमाम स्थितियों के मद्देनजर निष्कर्षस्वरूप यही कहा जा सकता है कि सरकार ने ’लोकल टू वोकल’ का नारा दे तो दिया है, पर अब वास्तविक धरातल लोकल को वोकल बनाने के लिए देसी प्रोडक्ट्स को उपयुक्त मार्केट देना भी सरकार की बड़ी चुनौती है। साथ ही डंपिग पॉलिसी में बदलाव की भी जरूरत है, जिसके जरिए विदेशी हमारे ही बाजार में अपना सामान बेहद सस्ते दामों में बेच कर मुनाफा कमा रहे हैं और हमारे उत्पादक अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहे हैं।

भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे प्रमुख रोजगार कार्यक्रमों की सूची

  1. ग्रामीण युवाओं के सशक्तिकरण के लिए प्रशिक्षण (ढठधडएच्): (1979) ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण द्वारा रोजगार उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई योजना।

  2. जवाहर रोजगार योजना (1989) : ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार प्रदान करने के लिए शुरू की गई योजना।

  3. स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना (1997) : इस योजना की शुरुआत स्वरोजगारया मजदूरी रोजगार के माध्यम से शहरी बेरोजगारी और अर्द्ध बेरोजगार गरीबों को लाभकारी रोजगार प्रदान करने के लिए की गई थी।

  4. स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (1 अप्रैल 1999) : ग्रामीण गरीबी और बेरोजगारी दूर करने और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए आरंभ की गई योजना।

  5. संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (सितम्बर 2001) : इसका उद्देश्य गरीब एवंजरूरतमंद परिवारों को रोजगार और खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराना है।

  6. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (फरवरी 2006) : गरीबीरेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले ग्रामीणों को वर्ष में 100 दिन का रोजगार देने की गारंटी प्रदान करने वाली योजना।

  7. प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (झचएॠझ): (15 अगस्त, 2008) : यह भारत सरकार का सब्सिडी युक्त कार्यक्रम है, जिसे दो योजनाओं- प्रधानमंत्रीरोजगार योजना (पीएमआरवाई) और ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम को मिलाकर बनाया गया है। इसका उद्देश्य देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों दोनों में ही रोजगार के अवसर पैदा करना है।

  8. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (जून 2011) : स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगारयोजना का पुनर्गठन।

  9. राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (23 सितम्बर 2013) : स्वर्ण जयंती शहरीस्वरोजगार योजना का पुनर्गठन।

  10. दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते योजना (16 अक्टूबर 2014) : श्रमिकों के लिएरोजगार, कौशल विकास और अन्य सुविधाओं में सुधार करने के लिए शुरू की गईयोजना।

  11. प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (15 जुलाई, 2015) : 14 लाख युवाओं कोकौशल प्रशिक्षण (कौशल विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित) प्रदान करने के लिए यहआरंभ की गई योजना।

 

सरकारी फाइलों में घट रही है बेरोजगारी दर

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (उचखए) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारी दर अगस्त में एक बार फिर से बढ़ गई है। उचखए के  सीईओ महेश व्यास की मानें, तो ”भारतीय श्रम बाजार अप्रैल और मई 2020 के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन महीनों के बाद से फिलहाल सबसे खराब स्थिति में है।”  उचखए की मासिक आंकड़ों के मुताबिक कोरोना की दूसरी लहर में जॉब मार्केट की स्थिति तुलनात्मक रूप से अधिक बिगड़ गई।  हालांकि जुलाई में जॉब मार्केट में  थोड़ा सुधार देखा गया था, लेकिन अगस्त में एक बार फिर से स्थिति मुश्किल हो गई अगस्त में शहरी बेरोजगारी दर लगभग 1.5 फीसदी बढ़ कर 9.78 फीसदी  तथा ग्रामीण बेरोजगारी दर 1.3 फीसदी बढ़कर 7.64 फीसदी हो गई। इसी तरह जुलाई में शहरी बेरोजगारी दर 8.3 फीसदी थी, जबकि ग्रामीण बेरोजगारी दर 6.34  फीसदी रहा। मार्च, 2021 में बेरोजगारी दर 6.50 फीसदी थी। वही अप्रैल में बढ़कर 7.97 फीसदी, मई में 11.90 फीसदी और जून में 9.17 फीसदी हो गई। शहरी  बेरोजगारी दर मार्च में 7.27 फीसदी थी, जो कि अप्रैल में बढ़कर 9.78 फीसदी, मई में 14.73 फीसदी और जून में 10.07 फीसदी थी। वहीं मार्च, 2021 में ग्रामीण  बेरोजगारी दर 6.15 फीसदी थी, जो अप्रैल में बढ़कर 7.13 फीसदी, मई में  10.63 फीसदी और जून में 8.75 फीसदी बेरोजगारी दर थी। हालांकि पिछले महीने राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (छडज)द्वारा जारी सावधिक श्रम सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, भारत की बेरोजगारी पहली तिमाही की तुलना में तुलनात्मक रूप से कम हुई है। पहली तिमाही में देश में बेरोजगारी दर जहां 20.9%  थी, वहीं दूसरी तिमाही में यह 8.4% घट कर 13.3% हो गई है।

 

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