संसद में ‘माननीय’ कहने योग्य बचे हैं नेता?

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां हर व्यक्ति अपनी पसंद से अपना प्रतिनिधि चुनता है और वह प्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्या को लेकर संसद में सरकार के साथ या फिर विरोध में रहता है। संसद की कार्यप्रणाली के अनुसार सरकार और विपक्ष एक साथ आकर देश के विकास को लेकर चर्चा करते हैं और जरूरी कानूनों को यहीं से पास किया जाता है लेकिन आज कल संसदीय प्रणाली की हालत बीमारु हो चुकी है और यहां सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कुछ राजनीतिक दल अपने निजी स्वार्थ के लिए संसद को नहीं चलने दे रहे हैं और लगातार हंगामा कर सदन की कार्रवाई भंग कर रहे है। दरअसल यह हंगामे की वजह सरकार और विपक्ष के बीच पैदा हुआ मतभेद है जिसे खत्म करना बहुत जरूरी है लेकिन यह खत्म होने की जगह बढ़ता ही जा रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र की मोदी सरकार सभी के विकास के साथ आगे बढ़ रही है लेकिन उसका झुकाव हिन्दुत्व की तरफ अधिक है। वहीं विपक्ष खुद को बाकी दलों का नेता बताते हुए सरकार के कामों का विरोध कर रहा है और इस विरोध की लड़ाई मे सदन का कामकाज पूरी तरह से ठप हुआ पड़ा है। 

 

लोकसभा में पूरे साल में तीन सत्र चलते हैं बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र। इन सभी सत्र में सरकार देश के सामने अपने कामकाज का लेखा जोखा पेश करती है, विपक्ष के सवालों का जवाब देती है और सत्ता व विपक्ष मिलकर किसी नये कानून पर विचार करते हैं और उसे पास या फिर रद्द किया जाता है। अब अगर पिछले कुछ सालों से सदन के कामकाज पर नजर डालें तो ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है। सदन की शुरुआत हंगामे से शुरु होती है और हंगामे पर ही खत्म हो जाती है। हाल ही में हंगामा और सदन की गरिमा को खंडित करने के आरोप में विपक्ष के 12 सांसदों को निलंबित कर दिया गया था जिस पर फिर से हंगामा हुआ और विपक्ष इस बात पर अड़ा रहा कि सदन का यह फैसला गलत है और उनका हंगामा करना उनके विरोध करने का तरीका है इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं हैं। 

सरकार और विपक्ष के आपसी तालमेल ना बनने की वजह से सदन के कार्यों को बाधित किया जा रहा है लेकिन अब सवाल यह उठता है कि इस सदन को चलाने में जो करोड़ों रुपये खर्च होते हैं वह तो जनता के हैं, फिर नेता जनता के पैसों की बर्बादी क्यों कर रहे हैं। सदन चलाने के लिए कोई नेता या सरकार पैसे नहीं देती है यह सब जनता के द्वारा अलग अलग रूप में दिया गया पैसा है जिससे सरकार सदन चलाती है। अब सवाल वहीं उठता है कि आखिर यह नेता जनता के पैसों को बर्बाद क्यों कर रहे है? सरकार के किसी भी काम या कानून से असंतुष्ट है तो आप जनता के बीच जाकर यह बात उन्हें बताएं ना कि सदन में हंगामा कर जनता के पैसों को बर्बाद करें। देश के मौजूदा हालात को देखा जाए तो विपक्ष सरकार के करीब सभी फैसलों से असंतुष्ट नजर आती है जिसका सीधा अर्थ यह है कि या तो सरकार के सभी फैसले गलत है या फिर विपक्ष किसी भी हाल में सरकार चलाने वाली पार्टी को कोई विकास का काम नहीं करने देना चाहती है। जुलाई में हुए मानसून सत्र में विपक्षी दलों के सांसद वेल तक घुस गए और स्पीकर के ऊपर पेपर फेंक दिया। 

सदन में जारी हंगामे को देखकर अब जनता भी परेशान हो चुकी है और वह चाहती है कि उनका पैसा बर्बाद ना हो और सभी पार्टियों के नेता सदन की कार्रवाई में शांति से भाग ले। सदन अपने नियमों और गरिमा के साथ चले जिससे उसे देखने वाली जनता का नेताओं पर विश्वास बना रहें। सदन में हंगामा करने से नेता अपनी खुद की प्रतिष्ठा खो रहे हैं। तमाम दलों के नेता वेल तक पहुंच जा रहे हैं और स्पीकर पर पेपर फेंकते हैं। सदन में उपस्थित सभी नेताओं को माननीय कहकर पुकारा जाता है लेकिन सदन में हो रहे बर्ताव को देखते हुए क्या उन्हें माननीय कहना ठीक है? सदन में जनता के करोड़ों रुपये को बर्बाद किया जा रहा है, स्पीकर पर पेपर उछाले जा रहे हैं और महिला सुरक्षाकर्मियों के साथ धक्का मुक्की की जा रही है क्या यह सब बर्ताव माननीय नेताओं के लिए शोभा देता है?   

अब हम बात करते हैं सदन पर होने वाले खर्च की, सिर्फ मानसून सत्र में हंगामे की वजह से करीब 133 करोड़ का नुकसान हुआ। मानसून सत्र में पेगासस, किसान आंदोलन और कृषि कानून को लेकर विपक्ष ने जोरदार हंगामा किया और एक भी दिन संसद को नहीं चलने दिया। एक रिपोर्ट के मुताबिक कुल 107 घंटों तक काम होना था जिसमें से सिर्फ 18 घंटे ही प्रश्नकाल चल सका बाकी समय हंगामे की भेंट चढ़ा। संसद पर हर एक मिनट का खर्च करीब 2.6 लाख रुपये होता है। 

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