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  विभिन्न संस्कृतियों की झांकी का साक्षीदार रहा               जौनपुर जनपद अपनी ऐतिहासिकता को बहुत अतीत तक समेटे हुए हैं। नदी गोमती के तट पर बसा यह शहर एक परम्परा के अनुसार महर्षि जमदग्नि की तपोस्थली रहा है। जिस कारण इसका प्रारम्भिक नाम जमदग्निपुर पड़ा तथा कालान्तर में जमदग्निपुर ही जौनपुर के रूप में परिवर्तित हो गया। कतिपय विद्वानों का मानना है कि यहां प्राचीन भारत में यवनों का अधिपत्य रहा है। जिस कारण इसका नाम प्रारंभिक दौर में यवनपुर से कालान्तर में जौनपुर हो गया।

            मध्यकालीन भारतीय इतिहास के स्रोतों ने जौनपुर की स्थापना का श्रेय फिरोजशाह तुगलक को दिया है। जिसने अपने भाई मोहम्मदबिन तुगलक (जुना खां) की स्मृति में इस नगर को बसाया और इसका नामकरण भी उसके नाम पर किया। फिरोजशाह तुगलक ने जौनपुर की स्थापना १३५९ ई. में की। तथा १३६० ई. में जौनपुर किले की नींव रखी। जौनपुर सल्तनत १३९४ से १४७९ ई. तक उत्तर भारत की स्वतंत्र राजधानी रही जिसका शासन शर्की सल्तनत द्वारा संचालित था। लेकिन एक खास बात यह है कि जौनपुर राज्य का संस्थापक मलिक सरदार (सरवर) फिरोजशाह तुगलक के पुत्र सुल्तान मोहम्मद का दास था जो अपनी योग्यता से १३८९ ई. में वजीर बना। सुल्तान मुहम्मद ने उसे मलिक-उस-शर्क की उपाधि से नवाजा था। १३९९ ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उस पद के कारण ही उसका वंश शर्की वंश कहलाया। ज्ञातव्य है कि उसकी कोई संतान नहीं थी। उसके बाद उसका गोद लिया हुआ पुत्र मुबारकशाह गद्दी पर बैठा था। १४०२ ई. में मुबारक शाह की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसका भाई इब्राहिम शाह शर्की जौनपुर राज्य सिंहासन पर बैठा। इब्राहिम शाह के बाद उसका पुत्र महमूद शाह, फिर हुसैन शाह तथा अन्तत: जौनपुर १४७९ ई. के बाद दिल्ली सल्तनत का भाग बन गया।

            जौनपुर में सरवर से लेकर शर्की बंधुओं ने ७५ वर्षों तक स्वतन्त्र राज्य किया। इब्राहिम शाह शर्की (१४०२-१४४०ई.) के समय में जौनपुर संस्कृतिक दृष्टि से उपलब्धि हासिल कर चुका था। उसके दरबार में बहुत सारे विद्वान थे जिन पर उसकी राज कृपा रहती थी। उसके राजकाल में अनेक ग्र्रंथों की रचना की गई। तत्कालीन समय में जौनपुर शिक्षा का बहुत बड़ा केन्द्र था। यह भी कहा जाता है कि इब्राहिम शर्की के समय में ईरान से आलिम (विद्वान) आए थे, जिन्होंने पूरे भारत में जौनपुर को शिक्षा का बहुत बड़ा केन्द्र बना दिया था। इसी कारण जौनपुर को शिराजय हिन्द कहा गया। शिराज का तात्पर्य श्रेष्ठता से होता है। उसी समय जौनपुर में कला स्थापत्य की एक नई शैली का जन्म हुआ। जिसे जौनपुरी अथवा शर्की शैली कहा गया। कलास्थापत्य के इस शैली का निर्देशन यहां पर आज भी अटाला मस्जिद में किया जा सकता है। अटाला मस्जिद की आधारशिला फिरोजशाह तुगलक द्वारा १३७६ में रखी गई। जिसे १४०८ में इब्राहिमशाह ने पूरा किया। जौनपुर में गोमती नदी के शाही पुल का निर्माण कार्य मुगल बादशाह अकबर ने १५६४ ई. में प्रारंभ करवाया, जो १५६९ ई. में बनकर तैयार हुआ। यह शाहीपुल अकबर के सुबेदार मनीम खां के निरीक्षण में बना। शर्की सुल्तानों ने जौनपुर में कई सुन्दर भवन, एक किला, मकबरा तथा मस्जिद बनवाई। जौनपुर की जामा मस्जिद को इब्राहिम शाह ने १४३८ ई. में बनाना प्रारंभ किया था और इसे १४४२ ई. में इसकी बेगम राजीबीबी ने पूरा करवाया। १४१७ ई. में चार अंगुल मस्जिद को सुल्तान इब्राहिम के अमीर खालिस खां ने बनवाया। जौनपुर की सभी मस्जिदों का नक्शा प्राय: एक जैसा है।                

       शेरशाह सूरी की सारी शिक्षा-दीक्षा जौनपुर में हुई। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और ख्याल के विकास में हुसैन सा (१४५८-१४७९ ई.) का अपना योगदान रहा। इस दौरान कई रागों की रचना की गयी। जिसमें प्रमुख है मलहार श्याम, गौर श्याम, भोपाल श्याम, जिनपुरी बसन्त, हुसैनी या जौनपुरी असावरी जिसे राग जौनपुरी क हा जाता है।

            भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जनपद के अमर शहीदों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा में अपना जीवन बलिदान कर दिया। आज भी जनपद के विभिन्न स्थानों पर स्थापित शहीद स्तम्भ उनके बलिदान के याद दिलाते हैं। इस जनपद के लोगों ने साहित्य, प्रशासनिक सेवा और विज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में पूरी दुनिया में जनपद का नाम रौशन किया है। इसकी निरंतरता अद्यतन बनी हुई है।

 

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