हिंदी विवेक : WE WORK FOR A BETTER WORLD...

ऐसा कहते हैं कि अतीत की परछाई बड़ी लंबी होती है। कहावत      तो मूल विदेशी है जहां अतीत और वर्तमान में स्पष्ट विभेद दिखाई देता है, जहां अतीत संग्रहालयों में बंद है और वर्तमान का अतीत से रिश्ता टूटा हुआ सा है। परन्तु भारत एक ऐसा अद्भुत देश है जहां हजारों वर्षों की धर्म, संस्कृति, कला की संस्कृति-गंगा अविरत बह रही है। ऐसे भारत में जब हम विलुप्त गावों और वहां के लोगों की बात करते हैं तो उसकी कहानी भी उतनी ही अद्भुत और आश्चर्यजनक बन कर उभर आती है। उसमें विचित्र मोड़ इसलिए आता है कि इस कहानी की ’खोज’ करने वाले लोग थे विदेशी, जिन्हें भारत की सभ्यता की निरंतरता का एहसास भी नहीं था, और उस पर विश्वास करने की इच्छा भी नहीं थी। सुधी पाठक जान गए होंगे कि हम यहां जिसे ’हड़प्पा’ संस्कृति कहा गया है उसकी बात कर रहे हैं।

हड़प्पा या मोहेंजोदाड़ो ये नाम ज्यादा प्रसिद्ध हैं, परन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि इस कहानी का वास्तविक प्रारंभ होता है कालीबंगन से। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगन में १९१४ से १९१८ के बीच में लुइगी तेसीतोरी नाम के इटली के व्यक्ति को यहां एक प्राचीन विलुप्त गांव के कुछ पुरातत्व अवशेष मिले। तेसीतोरी ने फ्लोरेन्स विश्वविद्यालय में संस्कृत, पाली, प्राकृत भाषाओं का जब अध्ययन किया तो वह भारत की इस विरासत की ओर इतना आकर्षित हुआ कि सीधा भारत में ही अध्ययन के लिए आ गया। राजस्थान में रामायण और अन्य ग्रंथों के अध्ययन के लिए घूमते समय उसे ये अवशेष मिले। वह इतना तो जान पाया कि आज तक विदेशियों को जिस सभ्यता का पता नहीं है ऐसी सभ्यता के ये अवशेष हैं। इसलिए उसने वे भेज दिए जॉन मार्शल के पास जो rchaeological survey of india का प्रमुख था। परन्तु वह भी उसका अर्थ समझ नहीं पाया क्योंकि तब तक हड़प्पा या मोहेंजोदाड़ो की खोज होनी थी। १९२४ में जॉन मार्शल ने जब लन्दन में बताया कि यह जो हड़प्पा और मोहेंजोदाड़ो में सभ्यता के अवशेष मिले हैं वे कम से कम ४००० हजार वर्ष पुराने हैं, तब यूरोपियन indology की कई प्रस्थापित मान्यताओं को धक्का पहुंचा। तब से लेकर आज तक इस सभ्यता पर निरंतर खोज हो रही है। राखिगढ़ी और भिराना जैसे हरियाणा के स्थानों पर आज भी उत्खनन हो रहा है। राखिगढ़ी आज एशिया के सब से बड़े पुरातात्विक स्थल के रूप में उभर कर आ रही है। नेचर मैगजिन के ऑनलाईन रिसर्च जर्नल ’Scientific reports’ में मई २०१६ में प्रकाशित अनुसंधान के अनुसार यह सभ्यता कम से कम ८००० वर्ष पुरानी है। यह खोज अभियान आयआयटी खड़गपुर, डेक्कन कॉलेज पुणे, और rchaeological survey of india के संयुक्त तत्वावधान में चलाया गया था। ये विलुप्त नगर, गांव और उसके लोगों की विरासत ने आज के भारत में एक ऐसे दिलचस्प विवाद को जन्म दिया है जो आज भी समाप्त नहीं हुआ है।

 आज तक की खोज क्या कहती है?

rchaeological survey of india के कार्य की गति बहुत धीमी होने के कारण इसमें रूकावटें हैं। कालीबंगन का ही उदाहरण देखे तो १९१८ में सबसे पहले खोजे गए इस स्थान पर rchaeological survey of india का उत्खनन प्रारंभ हो गया १९६० के दशक में और उसकी अंतिम रिपोर्ट प्रकाशित हुई २००३ में। परन्तु इस सभ्यता की ओर दुर्लक्ष्य होने का और एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि इस खोज से बाहर आने वाले तथ्य आज तक के प्रस्थापित इतिहासकारों की पोल खोल देने वाले हैं।

इसके बावजूद १९२० के आसपास प्रारंभ हुए इस खोज अभियान में आज तक इस सभ्यता के विशाल स्वरूप का पता चल चुका है। आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात इन प्रांतों में इसकी सभ्यता के १४०० केन्द्रों को खोजा जा सका है तथा और भी मिलने की सम्भावना है। इसका क्षेत्रफल आधुनिक पाकिस्तान से तो बड़ा है ही, प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया से भी बड़ा है। ईसा पूर्व तीसरी और दूसरी सहस्राब्दी में संसार में किसी भी सभ्यता का क्षेत्र इस से बड़ा नहीं था।

इन अवशेषों से पता चलता है कि यह एक विकसित संस्कृति थी। सुनियोजित नगर रचना, जल प्रबंधन, घरों में पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया। यह ईंटें इतनी अच्छी थीं कि १८५६ में कराची से लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन द्वारा हड़प्पा से प्राप्त इन ईंटों का उपयोग किया गया! उस बेचारे को पता नहीं होगा कि वह एक अमूल्य धरोहर को नष्ट कर रहा है। कार्यशालाओं के लिए WorkshopAbj भवन, विविध उपकरणों में कांस्य का प्रयोग, मूर्ति कला, विविध धातुओं का उपयोग, कुछ स्थानों पर अन्न पीसने की चक्की, दिशा मापक यंत्र इत्यादि कई चीजें यह दर्शाती हैं कि उस समय की किसी भी सभ्यता की तुलना में यह सब से विकसित सभ्यता थी। लोग नौकानयन जानते थे और दूर-दूर के देशों से व्यापार भी करते थे। गुजरात के लोथल में तो नौकाओं की मरम्मत के लिए गोदी dry dock के भी अवशेष मिले हैं।

ऐसी विकसित सभ्यता के बारे में सब से बड़े दो प्रश्न इतिहासकारों के सामने खड़े हुए। एक तो यह था कि तब तक जो भी सभ्यताओं के अवशेष दुनिया में मिले थे वे सारी सभ्यताएं नदियों के किनारे विकसित हुई थीं। परन्तु ये जो शहर और गांव मिल रहे थे वे किसी भी जल स्रोत के पास नहीं दिख रहे थे। दूसरा प्रश्न यह था कि आखिर इतनी विकसित सभ्यता के लोगों का आगे क्या हुआ? कहां गए वे लोग? और थे कौन?

 यूरोपियन दृष्टिकोण

यूरोपियन Indology के विशेषज्ञ तब तक यह मानते थे कि भारत वर्ष का सारा ज्ञात इतिहास २५००-३००० वर्षों से ज्यादा नहीं है। और उसमें भी जो सभ्यता यहां विकसित हुई वह आर्यों ने लाई जो भारत के बाहर से २५०० वर्ष पहले भारत में आए। फिर उनके सामने यह प्रश्न खड़ा हुआ कि वे लोग कौन थे जो हजारों वर्षों से इतनी विकसित सभ्यता के रूप में यहां रह रहे थे? तो उन्होंने यह कहा कि ये लोग जरूर भारत के आर्य पूर्व लोग थे, जिनको आर्यों ने नष्ट कर दिया। परन्तु आर्यों की भाषा तो संस्कृत थी, तो फिर इन लोगों की भाषा कौन सी? तो यूरोपियन Indology के विशेषज्ञ लोगों ने कहा कि ये तो खोजना पड़ेगा! इसलिए वहां उत्खनन में जो भी मुद्राएं मिलीं उन पर जो अक्षर या चित्र आदि मिले वे किसी अन्य भाषा के वर्णमाला के अक्षर है ऐसा मान कर उनका अर्थ लगाने का प्रयास किया गया। यह प्रयास आज तक सफल नहीं हुआ। तो इस दृष्टिकोण के कारण विरोधाभास ऐसा होता है कि हजारों वर्ष अपने वेदों में यहां की नदियों का और पर्वतों का गान और स्तवन करने वाले आर्यों के देश का पता नहीं चलता और इतनी प्रगत संस्कृति और सभ्यता का निर्माण करने वाले लोगों की भाषा का पता नहीं चलता। जहां जल स्रोत नहीं ऐसे स्थान पर उन्होंने ऐसे शहर कैसे बसाए इसका भी पता नहीं चलता।

 भारतीय दृष्टिकोण

इसलिए भारतीय धरोहर को प्रमाण मानने वाले जो इतिहासकार सामने आए, उन्होंने कहा कि ऐसे ऊटपटांग सिद्धांतों की वास्तव में जरूरत नहीं है। वेदों में और अन्य साहित्य में जिस सरस्वती नदी का गान किया गया, और स्पष्ट रूप से कहा गया कि वह सरस्वती काल के प्रभाव में विलुप्त हो गई और उसके कारण वहां बसने वाले लोग विस्थापित हो गए तो उसी सरस्वती सभ्यता के ये अवशेष होने चाहिए। इसलिए जाने माने पुरातत्ववेत्ता श्री वाकणकर और अन्य कई लोगों ने वैदिक सरस्वती की खोज प्रारंभ की। महाभारत में उल्लेख आता है कि बलराम जब युद्ध में भाग न लेने की इच्छा से तीर्थयात्रा पर चले गए तो उन्हें कई स्थानों पर सरस्वती नदी का पात्र सूखा हुआ मिला, याने उस समय सरस्वती नदी विलुप्त होने के कगार पर थी। ऐसे वर्णित कुछ स्थान श्री वाकणकर की यात्रा में ऐसे मिले जहां नदी का तो कोई अस्तित्व नहीं था पर उस आश्रम को तब भी सरस्वती के किनारे का आश्रम ही कहा जाता था! तब से लेकर आजकल जो सैटेलाइट द्वारा भूमि का अनुसंधान किया जाता है उसमें मिलने वाले प्रमाणों से सरस्वती नदी कहां से बहती होगी इसका एक पूरा चित्र सामने आ गया है। ऊपर जिन एक हजार से अधिक पुरातात्विक स्थलों की चर्चा की गई वे सारे स्थान ठीक इसी नदी घाटी के क्षेत्र में आते हैं। इसलिए संभव है की आने वाले दिनों में यह पूरी तरह से स्थापित हो जाएगा कि ‘हड़प्पन सभ्यता’, ‘सिन्धु घाटी सभ्यता’ जैसे नामों से आज जिसे संबोधित करते हैं वह वास्तव में सरस्वती सभ्यता है, और वही लोग आगे चल कर गंगा और यमुना के दोआबों में बसे। इसलिए भारत में एक ही सभ्यता निरंतर विकसित होते हुए चलती आ रही है। सरस्वती सभ्यता में प्राप्त कई मुद्राओं में दिखाई देने वाली परम्पराएं जैसे माथे पर लगने वाला सिंदूर, हाथ में पहनने के कंगन इत्यादि आज भी भारत में दिखाई देती हैं।

  पुरातत्व: कुछ दिलचस्प बातें

पुरातत्व विभाग कहने पर कुछ गलतफहमियां हमेशा मन में रहती हैं। एक तो उत्खनन कहने से यह चित्र सामने आता है कि जमीन में खुदाई करके पुरातात्विक स्थल निकाले जाते हैं। वास्तविकता यह है कि ये सारे स्थल जमीं के ऊपर ही होते हैं। बहुत वर्षों से बंद हवेली में जिस प्रकार धूल-मिट्टी इकट्ठा होना चालू होता है वैसे ही कई हजार वर्ष होने के बाद यह धूल-मिटटी पूरे शहर, गांव या बस्ती को ही निगल लेती है और उसके स्थान पर एक टीला बन जाता है। इस टीले की खुदाई और वह भी बहुत नजाकत से, पुरातत्व शास्त्र के अनुसार, होती है तब कहीं जाकर पुराने अवशेष मिलते है। ’इंडियाना जोन्स’ जैसे सिनेमे देखकर कई बार ये लगता है की ऐसे सभी अवशेष घने जंगलों में ही मिलते हैं। अफ्रीका या अमेरिका जैसे देशों में यह होता भी है क्योंकि वहां तो पुरानी सभ्यताओं को नष्ट करके ही नए आक्रामक जाकर बसे। परन्तु भारत इस मामले में भी अलग देश है। अभी हरियाणा में राखीगढ़ी में जो पुरातात्विक खुदाई चल रही है वहां तो जहां खेती अभी भी हो रही है ऐसे स्थानों में भी अवशेष मिल रहे हैं।

पिछले शतक में पूरी दुनिया में पुरातत्व के अनुसंधान कर्ताओं ने जो प्रमुख स्थान ढूंढ़ कर निकाले उनमें पेरू देश में माछू पीछू, कम्बोडिया में अंकोर वट, जॉर्डन में पेट्रा, सीरिया में पल्मायरा (जिन अवशेषों को अभी-अभी इस्लामी आतंकवादियों ने नष्ट किया) ये प्रमुख स्थान हैं। अमेरिका में माया और इंका सभ्यता के अवशेष हैं। ये सारा अनुसंधान तब हुआ जब विज्ञान इतना प्रगत नहीं था। अभी रिमोट सेंसिंग, सैटेलाइट इमेजिंग जैसे नए तंत्र जब आए हैं तो संभव है कि आने वाली शताब्दी मानव जाति के विलुप्त इतिहास पर और भी नया प्रकाश डालेगी। और फिर भी संभव है की सरस्वती सभ्यता जैसी विशाल पुरातात्विक खोज फिर कभी नहीं होगी। क्योंकि यह एक ऐसी सभ्यता है जो वास्तव में कभी नष्ट हुई ही नहीं।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu
%d bloggers like this: