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भारत में विभिन्न बोलियों के रूप में लगभग सात सौ अस्सी भाषाएं प्रचलित हैं। इनको छियासठ लिपियों के द्वारा लिखा जाता है। भारत के संविधान द्वारा बाईस भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। इनमें जनसंख्या, क्षेत्रीय विस्तार और बोलियों की संख्या की दृष्टि से हिंदी सब से बड़ी भाषा है। लगभग पैंतालिस करोड़ लोग देश में हिंदी बोलते हैं। इसके विकास में संस्कृत, अपभ्रंश, उर्दू, फारसी सहित भोजपुरी, अंगिका, बज्जिका, अवधि, बुन्देलखंडी, ब्रज, कुमायूंनी, गढ़वाली, मेवाड़ी, मेवाती, राजस्थानी, भीली, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी और देशज-विदेशज भाषाओं-बोलियों का योगदान रहा है।

 

देश के हिंदी भाषी राज्यों के साथ ही गैर हिंदी भाषी राज्यों में भी इसके बोलने वालों की बड़ी संख्या है। इन राज्यों में यह संपर्क भाषा के रूप में बोली, लिखी और पढ़ी जाती है। इसके अलावा दुनिया के अनेक देशों में लगभग बारह-तेरह करोड़ लोग हिंदी का प्रयोग करते हैं। जहां-जहां भी भारतीयों के पांव पड़े, हिंदी के साथ पड़े। मारीशस, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका, जावा, सुमात्रा, बर्मा, फिजी, घाना, सूरीनाम, नेपाल इत्यादि देशों में बसे करोड़ों भारतवंशियों की भाषा हिंदी है। कई देशों में तो हिंदी की शाखाएं विकसित हो रही हैं। फिजी में ‘फिजिबात’, सूरीनाम में ‘सरनामी’, उज्बेकिस्तान और कजाकिस्तान में ‘पारया’, दक्षिण अफ्रीका में ‘नेताली’ हिंदी की ही नई शैलियां हैं। यहां तक की कुछ शैलियों ने तो अपने व्याकरण और कोश बना लिए हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन के समय अनेकानेक भारतीय भाषा-भाषी लोग थे, जिन्होंने हिंदी में काम किया। धार्मिक आंदोलन, शिक्षा के प्रचार-प्रसार, सामाजिक कार्य, व्यापारिक गतिविधियां, राजनीतिक कार्य में शामिल अनेक गुजरती, मराठी, बंगाली, ओडिसी, तमिल, मलयाली भाषी लोगों ने हिंदी को जी-जान से चाहा है और प्राणपण से इसकी सेवा की है।

हिंदी साहित्य के इतिहास पर दृष्टिक्षेप करने पर हम पाते हैं कि मध्यकाल का साहित्य भक्ति काव्य के रूप में इतना उज्ज्वल, सशक्त, समृद्ध और विविध रूप वाला है कि वैसा अद्भुत साहित्य उतनी बड़ी संख्या में फिर कभी नहीं लिखा गया। लोकजीवन में वह कभी लोकोक्ति के रूप में, कभी कहावत बन कर तो कभी उदाहरण की तरह निरंतर प्रयोग में आता रहा है वह साहित्य हमारे संस्कारों में घुल मिल गया है। हिंदी भाषी सूर, तुलसी, कबीर, मीरा को हमने जितने सम्मान और रूचि के साथ अपने जीवन में शामिल किया है उतनी ही श्रद्धा और सम्मान के साथ रसखान, रहीम, ज्ञानेश्वर, नामदेव, गुरु नानक, चैतन्य महाप्रभु, नरसी मेहता को भी सर आंखों पर बैठाया है। देश का आध्यात्मिक वातावरण विभिन्न भाषा-भाषियों को निकट लाने में सहयोगी रहा है। उत्तर भारत के तीर्थ यात्री जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, श्रीशैलम, द्वारका, कन्याकुमारी की यात्रा पर सदियों से जाते रहे हैं तो दक्षिण और पश्चिमी भारत के लोग काशी, मथुरा, प्रयाग, अयोध्या, गया, हरिद्वार, बदरीनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ, वैष्णव देवी की यात्रा करते रहे हैं। सभी भाषा-भाषी लोग आपस में मिलते-जुलते हैं। इन सबकी एक ही सम्पर्क भाषा होती है, वह है हिंदी।

स्वतंत्रता आंदोलान के समय वैचारिक आदान-प्रदान और जनता के बीच संदेश पहुंचाने के लिए जब पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया गया, पर्चे छापे जाने लगे और जन सभाओं का आयोजन किया जाने लगा, तो सबके बीच एक सूत्र के रूप में हिंदी भाषा ही थी। देश के सभी भाषा-भाषी पत्रकार, समाजसेवक, राजनेता, वकील, शिक्षक, जब एक मंच पर इकट्ठा होते थे तब उनके संवाद की भाषा हिंदी ही होती थी। इन सब में गैर हिंदी भाषियों की संख्या अधिक होती थी। जब भी उन्हें अपनी बात राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचानी होती थी, तब हिंदी का सहारा लेना पड़ता था। इसलिए उस समय के सभी शीर्ष नेतृत्व को हिंदी सीखना पड़ता था। हिंदी सीख कर वे अपने कौशल में वृद्धि करने के साथ-साथ हिंदी की सेवा भी कर रहे थे। उनके ऐसे पत्र और पत्रिकाएं स्वतंत्रता आंदोलान के समय देश के गैर हिंदी भाषी क्षेत्र से निकलती थीं, जिनके हिंदी परिशिष्ट भी होते थे। मराठी भाषी केशव वामा पेठे ने १८९३ ई. में ‘राष्ट्रभाषा किंवा सर्व हिन्दुस्थानची एक भाषा करणे’ नामक पुस्तक पुणे से प्रकाशित की थी, जिसमें उन्होंने हिंदी को सर्वस्वीकृत राष्ट्रभाषा बनाने पर जोर दिया था। इसी तरह अनेक महानुभावों का सार्थक योगदान हिंदी को राष्ट्रीय भाषा की स्वीकृति, प्रचार-प्रसार और लोकप्रिय बनाने में रहा है।

महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से लौट कर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के पूर्व देश का भ्रमण किया। वे गुजराती भाषी थे और अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे, किन्तु भारत पहुंच कर उन्होंने हिंदी में ही अपनी बात रखना शुरू किया। चम्पारण के किसान आंदोलन का नेतृत्व करते हुए वे लगभग छः महीने वहीं किसानों के बीच में रहे। उस कालखंड में उनका देश भर में हिंदी में ही संवाद होता था। आगे चल कर जब वे स्वतंत्रता आंदोलन में पूरी तरह सम्मिलित हो गए, तब छुआछूत, हरिजनोद्धार, भाषा विवाद के समापन इत्यादि पर गंभीरता से कार्य शुरू किया। उन्होंने ‘हरिजन’ नामक पत्र हिंदी में निकालना शुरू किया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की बैठक में हिंदी में ही बातचीत होती थी। सेवाग्राम में रहते हुए वे अपना पूरा पत्राचार हिंदी में ही करने का आग्रह करते थे। अपनी ‘आत्मकथा’ के भाग-पांच, अध्याय-छत्तीस में वे एक प्रसंग स्मरण करते हुए लिखते हैं, दिल्ली के मुसलमानों के सामने मुझे शुद्ध उर्दू में लच्छेदार भाषण नहीं करना था, बल्कि अपना अभिप्राय टूटी-फूटी हिंदी में समझा देना था। यह काम बड़े मजे से कर पाया। हिन्द स्वराज के प्रकाशन काल १९०१ से १९३६-३७ तक महात्मा गांधी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की लगातार मांग करते रहे। यद्यपि बाद में वे हिन्दुस्तानी के पक्षधर हो गए थे, फिर भी हिंदी को व्यापक आधार की भाषा मानते रहे।

हिंदी के महत्व को समझते हुए देश को एकसूत्रता में बांधने का संकल्प स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने जब लिया, उस समय अध्यात्म के क्षेत्र में संस्कृत के साथ-साथ देशज बोलियों का चलन था। किन्तु उन्होंने हिंदी की शक्ति को पहचान लिया था। इसीलिए अपने सब से प्रमुख ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिंदी में की। वे गुजराती भाषी थे। संस्कृत के विद्वान थे, फिर भी आर्यसमाज के विस्तार, प्रचार प्रसार का माध्यम हिंदी को बनाया। चारों वेदों का भाष्य हिंदी में लिखा। यद्यपि उनकी भाषा सामान्य हिंदी थी, फिर भी अपने भावों को वे बहुत अच्छी तरह से प्रस्तुत कर सके हैं। उनके प्रवचन प्रायः हिंदी में ही होते थे। सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में वे लिखते हैं, जिस समय मैंने यह ग्रंथ बनाया था उस समय और उससे पूर्व संस्कृत में भाषण करने, पठन-पाठन में संस्कृत ही बोलने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती होने के कारण मुझे इस (हिंदी) भाषा का विशेष ज्ञान न था। इससे भाषा अशुद्ध बन गई है। इतना सब होने पर भी हिंदी भाषा के प्रति उनका आग्रह स्तुत्य हैं।

हिंदी को देश की भाषा मानने वालों में रा.स्व.संघ के द्वितीय सरसंघचालक माननीय माधव सदाशिव गोलवलकर का नाम अग्रगण्य हैं। वे मराठीभाषी थे। विज्ञान का विद्यार्थी होने के कारण उच्चशिक्षा अंग्रेजी में प्राप्त की थी, किन्तु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के रूप में उन्होंने अभिव्यक्ति का माध्यम हिंदी को बनाया। उन्होंने तैंतीस वर्षों के लम्बे कालखंड में छियासठ बार भारतमाता की परिक्रमा की थी। सहस्रों व्याख्यान दिए। छोटी-बड़ी हजारों बैठकों में शामिल हुए। अनगिनत पृष्ठों को अपनी लेखनी से धन्य किया। यह सब हिंदी में ही होता था। देश भर में संघ का काम फैला था। सभी प्रांतों में उनका प्रवास होता रहता था। तमिलनाडु का एक प्रसंग बताते हुए उन्होंने एक बार कहा, तमिलनाडु के एक शिक्षा वर्ग में हमारे कार्यकर्ताओं ने चाहा कि मैं अंग्रेजी में बोलूं। मैंने उनसे कहा कि मैं अंग्रेजी बोलूं या हिंदी में, तमिल में अनुवाद तो किया जाएगा ही। इसलिए दोनों में से किसी एक भाषा में बोलना एक समान ही है। मैं हिंदी में सहजतापूर्वक बोल सकता हूं इसलिए मैं हिंदी में ही बोलना चाहूंगा। फिर भी पहले दिन मैं अंग्रेजी में और अन्य दिनों में हिंदी में बोला। बाद में शिक्षर्थियों से पूछा तो पाया कि अंग्रेजी की अपेक्षा हिंदी अधिक लोगों की समझ में आई यह स्वाभाविक ही है। गैर हिंदीभाषी क्षेत्रों में हिंदी शिक्षण के विस्तार में श्री गोलवलकर जी सदा समर्थक रहे। उन्होंने आंध्र प्रदेश के एक विधायक श्री वासुदेव नाईक को ५ जुलाई, १९६१ को पत्र लिख कर शुभकामना दी। उन्होंने लिखा, हैदराबाद में हिंदी विद्यालय की स्थापना बहुत महत्वपूर्ण बात है। अपने देश की राष्ट्रभाषा या राज्य व्यवहार की भाषा के नाते हिंदी का महत्त्व अनन्य साधारण है। २ मार्च, १९५० को हरियाणा के रोहतक में आयोजित हरियाणा प्रांतीय हिंदी सम्मलेन में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था, हिंदी को विश्वभाषा बनाना है।

हिंदी पत्रकारिता में जिन गैर हिंदीभाषी पत्रकारों का महत्वपूर्ण योगदान हैं, उनमें बाबुराव विष्णु पराडकर का नाम बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे कोलकाता में नेशनल कालेज में हिंदी और मराठी के शिक्षक थे। उस समय योगीराज अरविंद घोष वहां प्राचार्य थे। पराडकर जी अपने मामा की पुस्तक देशेर कथा का हिंदी में अनुवाद करके चर्चित हो गए। उन्होंने कोलकाता से ही भारतमित्र नामक पत्र हिंदी में निकाला। उसके सम्पादक के नाते उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। पराडकर जी के सहयोग से वाराणसी से हिंदी का ‘आज’ दैनिक प्रकाशित हुआ। उसके सम्पादक के रूप में उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को भाषाई अखबार से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय पहचान दी। उन्होंने हिंदी की पत्रकारिता की भाषा का गठन किया। हिंदी के अनेक शब्द स्वयं गढ़े और अंग्रेजी का विकल्प प्रस्तुत किया। विदेशी शब्दों का गजब का भारतीयकरण कर दिया। मानकीकरण, मुद्रास्फीति और नेशन को राष्ट्र शब्द उन्होंने ही दिया। ‘आज’ अखबार वाराणसी सहित अनेक नगरों से आज भी निकल रहा है।

मुंबई में भारतीय विद्या भवन के संस्थापक और कुलपति स्व. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का हिंदी प्रेम जगजाहिर हैं। वे एक विद्वान राजनेता थे। लगभग पैंसठ वर्ष पूर्व उनके मार्गदर्शन में मुंबई से ‘नवनीत’ का प्रकाशन शुरू हुआ। यह हिंदी की पहली ‘डाईजेस्ट’ हैं। साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में इस पत्रिका का उल्लेखनीय योगदान रहा है। मुंशी जी ने ग्रंथों की रचना हिंदी में करके इस भाषा के प्रति अपनी आत्मीयता प्रदर्शित की है। गुजराती भाषी मुंशी जी ने महाभारत के पात्रों- योगेश्वर श्रीकृष्ण, कुंती, युधिष्ठिर, पितामह भीष्म, द्रौपदी इत्यादि का जीवनचरित्र लिख कर हिंदी की बड़ी सेवा की है। वाल्मीकि रामायण का हिंदी में वृहद अनुवाद की भी उनकी योजना थी। राजनेता के रूप में और महामहिम राज्यपाल रहते हुए कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने हिंदी भाषा में ही अधिकांश काम किया करते थे।

वर्तमान समय में देश भर में अनेक गैर हिंदी भाषी विद्वान हिंदी की सेवा में जुटे हुए हैं। ग्वालियर निवासी श्री श्रीधर गोविन्द पराडकर जी का योगदान प्रशंसनीय है। विगत कई दशकों से देश-विदेश में साहित्यिक गोष्ठियों, संवादों, बैठकों में हिंदी उनके चिंतन का प्रमुख विषय होती है। उन्होंने लगभग दो दर्जन पुस्तकों की रचना हिंदी में करके इसके प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित किया है। उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘१८५७ के प्रतिसाद’, ‘अद्भुत संत स्वामी रामतीर्थ’, ‘अप्रतिम क्रांति द्रष्टा भगत सिंह’, ‘राष्ट्रसंत तुकडोजी’, ‘राष्ट्रनिष्ठ खंडोबल्लाल’, ‘सिद्ध योगी उत्तम स्वामी’, ‘मध्य भारत की संघ गाथा’, ‘ज्योति जला निज प्राण की’ इत्यादि हिंदी की विरासत हैं। ‘श्री गुरूजी समग्र’ का बारह खण्डों में सम्पादन करके भागीरथ कार्य किया है। ‘सामाजिक क्रांति की यात्रा और डॉ. आंबेडकर’ का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया है। देश-विदेश की यात्रा का संस्मरण ‘देशांतर’ और ‘साहित्य संवर्धन यात्रा’ के रूप में हमारे सम्मुख है। उनका यह सारा रचना संसार हिंदी में है, जबकि उनकी मातृभाषा मराठी है।

इन महानुभावों के अतिरिक्त ऐसे बहुत से विद्वान हुए हैं जिन्होंने अपनी मातृभाषा के साथ ही हिंदी की बड़ी लगन से सेवा की। विनोबा भावे ने वर्धा में हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना का बीजारोपण महात्मा गांधी के इच्छानुसार विद्यालय के रूप में किया था। बंगाल के राजा राम मोहन राय, केशवचंद्र सेन ने अपने समय में देश की धड़कन हिंदी को मानते हुए इसके उत्थान में योगदान किया था। ओडिशा के विशाखापत्तनम की प्रो. एस. शेषारत्नम विगत कई वर्षों से दक्षिण भारत में हिंदी के विकास में सहयोग कर रही हैं। चेन्नई से प्रकाशित ‘चंदामामा’ के हिंदी संस्करण के पूर्व संपादक डॉ. बालशौरी रेड्डी आजीवन हिंदी की सेवा करते रहे। तमिलनाडु में विरोध होने के बावजूद उन्होंने हिंदी पत्रिका का न केवल सम्पादन जारी रखा बल्कि हिंदी की शुद्धता और उत्कृष्टता का सदैव ध्यान रखा। तमिलनाडु के ही डॉ. एन. गोविंदराजन दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार में अब भी अपना योगदान कर रहे हैं। पंजाबी भाषी अंग्रेजी के विद्वान डॉ. नरेन्द्र कोहली ने साहित्य सृजन के लिए हिंदी को अपनाया। अपने व्यंग्य लेखन के द्वारा उन्होंने हिंदी हास्य-व्यंग लेखन को तो समृद्ध किया ही है, रामकथा पर आधारित उपन्यास ‘अभ्युदय’ (चार खण्डों में) और महाभारत पर आधारित आठ खण्डों में ‘महासमर’ की रचना करके हिंदी लेखन में एक नई दिशा निर्धारित की है। ‘सैरन्ध्री’, ‘वसुदेव’ आदि उपन्यास हिंदी की धरोहर बन गए हैं।

मराठी भाषी के अनेक साहित्यकार हिंदी लेखन के माध्यम से स्वयं विख्यात हुए और हिंदी-सेवा का श्रेय भी प्राप्त किया। कोल्हापुर निवासी डॉ. अनंत सदाशिव उल्तेकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में भारतीय संस्कृति विभाग के अध्यक्ष थे। वे सदैव अपना शोधपत्र हिंदी में प्रस्तुत करते थे। पुणे के ठाकरसी महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. काशीनाथ केरकर ने ‘अठारहवीं शती के हिंदी पत्र’ पर पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की थी। उनके ही साथी श्री कृष्णजी हरिपंत देशपांडे ने महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की ओर से लगातार अठारह वर्षों तक हिंदी का प्रचार-प्रसार करते रहे। नरदेव शास्त्री के नाम से ख्यातिप्राप्त मराठी भाषी विद्वान नरसिंह राव हिंदी और संस्कृत के प्रकांड ज्ञाता थे। महात्मा मुंशीराम ने जन शिवालिक की उपत्यका में हरिद्वार के समीप गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की तो हिंदी के माध्यम से वेद, उपनिषद, भारतीय दर्शन शिक्षा और शोध कार्य का दायित्व सौंपा। ६ नवम्बर १८८३ को जन्में हिंदी प्रेमी वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मण नारायण गर्दे ने हिंदी में ‘भारत मित्र’ समाचार के प्रकाशन में योगदान और ‘महाराष्ट्र रहस्य’ नाम से लेखमाला लिखी। लखनऊ से जब ‘नवजीवन’ का प्रकाशन शुरू किया गया तो गर्दे जी को उसका प्रथम सम्पादक बनाया गया। नाशिक के हिंदी प्रेमी श्री रघुनाथ वैशंपायन के प्रयास से वर्ष १९४० में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मलेन पुणे में हुआ। वैष्णव संत नामदेव के अनेक अभंग हिंदी में हैं, जिन्हें काशी, प्रयाग, अयोध्या की यात्रा के दौरान उन्होंने लिखा था। हिंदी को प्रतिष्ठित करने में वामन पंडित, मुक्तेश्वर, स्वातंत्रवीर सावरकर, खांडेकर, कवि गोविंद केलकर जैसे उद्भट विद्वानों का सहयोग रहा है।

हर वर्ष १० जनवरी को ‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाया जाता है। वस्तुतः इसी तारीख को वर्ष १९७५ में मराठी भाषी पत्रकार अनंत गोपाल शेवडे के सत्प्रयास से नागपुर में पहला विश्व हिंदी सम्मलेन आयोजित किया गया था। दसवां सम्मेलन वर्ष २०१६ में भोपाल में संपन्न हुआ विषय, विस्तार और विश्व भागीदारी की दृष्टि से यह सर्वोत्तम सम्मलेन था। इसके बारह सत्रों में एक सौ चौतीस विचार पत्र प्रस्तुत किए गए थे, जिनमें यह प्रमुख प्रस्ताव था कि अन्य भाषा-भाषी राज्यों में हिंदी को बढ़ावा देने पर बल देने के साथ ही संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने में अन्य देशों का समर्थन जुटाने के लिए भारतीय दूतावासों/मिशनों को और अधिक प्रयास करना चाहिए। वर्ष २०१८ में ग्यारहवां विश्व हिंदी सम्मलेन मारीशस में होगा। वहीं इसका मुख्यालय भी है। जिसके भव्य भवन का शिलान्यास २०१५ में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने किया।

हिंदी को गैर हिंदी भाषी राज्यों में आधिकारिक प्रयोग करने के सम्बंध में गठित संसदीय समिति की रपट अभी हाल ही में तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी जी को सौंपी गई थी। इसकी सिफरिशों को मंजूर कर लिया गया है। इसके अनुसार राष्ट्रपति और सरकार के सभी मंत्रियों समेत सभी प्रतिष्ठित पदों पर आसीन व्यक्तियों, जिन्हें हिंदी आती है, के लिए अपने वक्तव्य हिंदी में देना जरूरी हो जाएगा। समिति ने यह भी सिफारिश की है कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में दसवीं तक की शिक्षा में हिंदी को अनिवार्य कर दिया जाए। इसकी मंजूरी राष्ट्रपति महोदय से मिल गई है। इसके लागू होने से देश के गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग तो बढ़ेगा ही, साथ ही अनेक विषयों की जानकारी भी हिंदी में मिलने लगेगी।

वर्तमान समय में सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के सहयोग से हिंदी देशभर की संपर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है। गैर हिंदी भाषी विद्वानों, साहित्यकारों, पाठकों ने इसके उत्थान, विकास, प्रचार, प्रसार, स्वीकृति में जितना योगदान है, वह प्रसंसनीय और अनुकर्णीय है। इन सबके द्वारा हिंदी को बढ़ावा देने से हमारी राष्ट्रीय एकजुटता पुष्ट हुई है।

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