उत्तराखंड में भाजपा का मास्टरस्ट्रोक

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उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन के भाजपा के निर्णय से जहां पार्टी और प्रदेश की जनता खुश है वहीं विपक्ष को कुछ कहते नहीं बन पा रहा है। उसके हौसले एकदम पस्त हो गए हैं।

2014 के बाद भारत की राजनीति में बदलाव

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यदि सरकारें संगठन के बलबूते बनती-बिगड़ती हैं तो राजनीति के माध्यम से समाज और व्यवस्था में सरकारी प्रयत्नों द्वारा लाये जा रहे बदलाव को गति प्रदान करने, उसे और प्रभावी तथा स्थायी बनाने में पार्टी के आम कार्यकर्ता की भी महती भूमिका हो सकती है। हमारी लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में इसकी व्यवस्था पूर्व से स्थापित है।

भाजपा की व्यूह  रचना धरी की धरी रह गई

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मेरठ कॉलेज से पढ़ाई पूरी कर 1970 में जीविकोपार्जन के लिए जब दिल्ली पहुंचा तब दिल्ली के राजनितिक क्षितिज पर महापौर लाला हंसराज गुप्त, चीफ मेट्रोपोलिटन काउंसिलर विजय कुमार मल्होत्रा, बलराज साहनी और मदनलाल खुराना जैसे भारतीय जनसंघ के नेता तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सशक्त नेतृत्व को सफल चुनौती दे रहे थे।

भाजपा के हाथ से फिसलते राज्यों के बहाने

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भारतीय जनता पार्टी एक गतिमान और उर्वरा राजनितिक दल है। पार्टी की रीति-नीति ऐसी है कि उसमें नेताओं की दूसरी/तीसरी पांत स्वतः ही तैयार होती रहती है।

ईमानदारी को राष्ट्रीयचरित्र बनाने का लक्ष्य

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कोई दायित्व सौंपते समय यदि कार्यकर्ता की सत्यनिष्ठा का स्तर भी देखा जाने लगे तो ईमानदारी को राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनते देर नहीं लगेगी। आज के दौर में सिर्फ भाजपा ही इस काम को बखूबी अंजाम दे सकती है। क्योंकि भाजपा के अधिकतर कार्यकर्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया में तप कर आते हैं।

उतार-चढ़ाव में ‘अटल’

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अटल जी अपनी बौद्धिक प्रगल्भता, ओजस्वी वक्तृत्व कला, हाजिर-जवाबी, आचरण, व्यवहार और मिलनसार स्वभाव के बल पर सर्वदूर समाज के सभी वर्गों के बीच लोकप्रियता के उच्चतम शिखर पर पहुंचे। इसके बावजूद उनके पैर अपनी वैचारिक सरजमीं पर मजबूती से जमे रहे। यथा नाम, तथा गुण की उक्ति जैसे मानो…

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