पी ले रे तू ओ मतवाला…

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१९३२ में 'मोहब्बत के आंसू' से अपना फ़िल्मी कैरियर शुरू करने वाले सहगल साहब को बड़ी पहचान मिली १९३५ में देवदास से. शरत बाबू के उपन्यास पर बनी यह फिल्म कुंदनजी की पहली बड़ी सुपरहिट फिल्म थी. फिर तो अगले ग्यारह साल के सुपरस्टार थे, सहगल बाबू. वैसे १९३४ में ही 'पूरन भगत' और चंडीदास' से ही लोगों को लग गया था कि बन्दे में पोटेंशियल है

वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी…

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बाजार की स्पर्धा ने मां-बाप और बच्चों के बीच दूरी पैदा कर दी है। बच्चे अकेले हो गए हैं। उनका अकेलापन मोबाइल, इलेक्ट्रानिक गेम और चैनल पूरा कर रहे हैं और हताशा में वे अनायास हिंसा को अपनाने लगे हैं। तितलियां अब भी गुनगुनाती हैं, आसपास मंडराती भी हैं, कागज भी है, कश्ती भी है, बारिश भी है; लेकिन बचपन खो गया है। कैसे लौटाये उस बचपन को? अखबारों में हमेशा की तरह खबरें पढ़ रहा था। ज्यादातर बेचैनी अखबारों से भी आती है। सामने आनेवाली खबर किस प्रकार से आपको बेचैन कर दे, कह नहीं सकते। ब्लू व्हेल गेम से सम्मोहित हो

पारंपरिक लोकनाट्य

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  उत्तर प्रदेश के इन लोकनाट्यों की चमक और आभा के कारण आज विश्व पटल पर हमारी एक विशेष पहचान है। ऐसे में हम सभी का यह कर्तव्य ही नहीं पूर्ण दायित्व है कि हम अपने इन अमूल्य लोकनाट्यों को संरक्षित कर प्रचार-प्रसार करते रहें। उत्तर प्रदेश भारत का एक ऐस

सौगात

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चिलचिलाती धूप के बाद पड़ने वाली बारिश की रिमझिम बूंदें तन के साथ मन को भी शीतल कर देती हैं॥ धरती की तपन और प्यास को तो यह बारिश बुझाती ही है, उदासीनता और अकर्मण्यता को भी दूर कर देती है॥

धन का भजन

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 इस रंग बदलती दुनिया में धर्म के बजाय धन का महत्व सभी सीमाएं पार कर रहा है। जैसे बहुत-से गुंडे नेताओं को हटा कर देश सेवा की कुर्सी फर बैठ गये हैं, उसी तरह एक दिऩ धन भी धर्म को हटा कर उसकी गद्दी फर बैठ जाएगा। धन की फूजा तो अब भी होती है, फिर तो बाकायदा फ्रार्थना शुरू हो जाएगी। मैंने भी उसकी एक स्तुति लिखी है। आफको जम जाए तो याद करके रख लीजिए, किसी दिन काम आएगी।

सुभाष अवचट: भगवा रंग के कुण्ड में कूद पड़ने की नियति

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उससे और उसके चित्रों से साबका साल-दर-साल होता रहा। उसके चित्रों की प्रदर्शनियां भी विशाल-से-विशालतर होती गईं। कई बार जहांगीर कला दीर्घा की पूरी की पूरी वातानुकूलित गैलरी तो कभी ऑडिटोरियम में।

बाल गंधर्व का अंदाजे-बयां क्या करें

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उन्नसवीं सदी के मध्य काल संगीत नाटकों का काल माना जाता है। मराठी रंगमंच ने बाल गंधर्व के रूप में ऐसा कलाकार दिया जिसका जादू आज भी कम नहीं हुआ है। उनकी स्त्री भूमिकाएं इतनी सजीव हुआ करती थीं कि महिलाओं में उन्हीं की शैली फैशन बन जाती थी। हाल में उन पर मराठी में एक फिल्म भी बनी है।

शगुन शगुन बरखा बरसे

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मध्य युग में उत्तरी भारत के किसानों के सर्वप्रिय मौसमी विज्ञानी कवि घाघ और भड्डरी थे। आज भी उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण जनों में घाघ की तथा पंजाब और राजस्थान में भड्डरी की कहावतें प्रचलित हैं।

पहाड़ी बटेर

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पहाड़ी बटेर याने लम्बी पूंछ वाला तित्तर। वह गौर तित्तर (Grey Partridge)से छोटा दिखता है। उसकी चोंच और पैर लालिमा लिए होते हैं। उसकी लम्बाई 25 सेे मी होती है।

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