भारतबोध का अभ्युदय और वामपंथ का उखड़ता कुनबा

सूचना क्रांति ने भारत के करोड़ों नागरिकों के मन मस्तिष्क से उन जालों को हटाने का काम किया है जिसे वामपंथियों ने नकली बौद्धिक गिरोहबंदी से खड़ा कर दिया था। ध्यान से देखा जाए तो भारत अब भारतबोध के साथ जीना सीख रहा है। पश्चिमी मीडिया के लिए भारत के हिन्दू तत्व औऱ दर्शन सदैव उसी अनुपात में हिकारत भरे रहे हैं जैसे कि भारत के वाम बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग प्रस्तुत करता आया हैं।

भारत में बौद्धिकता के नाम पर एक बड़ी गैंग स्वतंत्रता के बाद से ही विमर्श के सभी आयामों पर हावी है। इस गैंग का घोषित एजेंडा है भारत के स्वत्व से जुड़े मामलों को अपमानित करना। भारतबोध के स्थान पर आयातित विचारों को लोकविमर्श का केंद्र बनाना। दुर्भाग्यवश देश की संसदीय राजनीति भी इस गिरोहबंदी की शिकार होकर चली है। इतिहास, संस्कृति, कला, रंगमंच से लेकर पत्रकारिता और जीवन के हर क्षेत्र में एक ताकतवर लॉबी है जो वास्तव में नियामकीय शक्तियों के साथ काम करती है। इसका एक सशक्त इकोसिस्टम है जो मामलों को पूरी ताकत से हवा देता है नतीजतन भारत तेरे टुकड़े होंगे या अफजल हम शर्मिंदा हैं’ जैसे अक्षम्य दुस्साहसी, अभिव्यक्ति की आजादी की शरण में जाकर सुरक्षित हो जाते हैं। देश में दशकों से सक्रिय इस गैंग के विदेशी खैरख्वाह भी कम नही हैं। पश्चिमी मीडिया से लेकर मानवाधिकार, पर्यावरण, जेंडर औऱ बाल अधिकार से जुड़े दबाव समूह इन्हें वैश्विक संरक्षण उपलब्ध कराते हैं। हाल ही में कोविड संक्रमण के दौर में विदेशी मीडिया का भारत को लेकर पक्षपातपूर्ण कवरेज इसकी बानगी भर है। हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति गुजरात के सीएम रहते हुए चलाया गया नफरत से भरा दुष्प्रचार अभियान उनके पीएम बनने के बाद भी जारी है। जिस गैंग ने उन्हें बदनाम करने का ठेका लिया था वह आज भी स्थानीय एवं विदेशी मीडिया में भारत को बदनाम करने से पीछे नहीं है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अब न केवल भारत की बहुसंख्यक आबादी बल्कि विदेशों में बसे लोग भी इस बात को समझ चुके है कि सेक्युलरिस्ट उदारवादियों का विदेशी नेक्सस(याराना)प्रायोजित होकर काम करता रहा है।

टाइम पत्रिका या वाशिंगटन पोस्ट की खबरों के आधार पर भारत के प्रति दृष्टिकोण निर्मित नहीं हो रहे हैं। भारत में ही यह संभव है क्योंकि यहां लोग भारत के स्वत्व औऱ महान गौरव को नकारकर विदेशी विचारों को संस्थागत रूप से आगे बढ़ाते रहे हैं? इसके मूल में हमें 70 के दशक की पहली अल्पमत सरकार के समय की चालाक सौदेबाज़ी को समझना होगा जब वामपंथियों ने इंदिरा सरकार को बचाने के एवज में देश की बौद्धिक ठेकेदारी अपने नाम कर ली। प्रगतिशीलता के नाम पर शिक्षा, साहित्य, कृषि, अनुसंधान, पत्रकारिता, कला, रंगमंच सभी जगह लाल रंग में रंगे हुए लोग पहुंच गए। जेएनयू , आईआईएमसी जैसे संस्थान उसी राजनीतिक सौदेबाजी के तहत अस्तित्व में आये। नतीजतन देश के बौद्धिक जगत पर वामपंथियों का एक छत्र राज स्थापित हुआ। कांग्रेस जो आजादी की लड़ाई का प्लेटफॉर्म था वह केवल चुनाव लड़ने और सरकार चलाने का लांचिंग पैड बनकर रह गई। विचारधारा शून्य होती कांग्रेस को जब सत्ता से बाहर होना पड़ा तो उसके पास अपनी कोई वैचारिक पूंजी रह ही नहीं गई। इस बीच बौद्धिक जगत में ऊपर से नीचे तक वही वर्ग हावी हो गया जो कांग्रेस के सरंक्षण में खड़ा तो हुआ लेकिन उसका नाता भारत और भारत की महान संस्कृति के स्थान पर छदम धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता, बहुलता, विविधता जैसी प्रस्थापनाओं से है। रोमिला थापर, इरफान हबीब, रामचन्द्र गुहा से लेकर कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवानी, शेहला मसूद की नजर से कांग्रेस भारत को देखने, समझने और नीति निर्माण के लिए विवश हो गई। गांधी के नाम से सत्ता का वरण करने वाली पार्टी के पास यह वैचारिक क्षमता ही गायब हो गई कि भारत की बहुसंख्यक आबादी क्या चाहती है। जैसा इन लाल गिरोहों ने नेतृत्व को समझाया वैसा ही स्वाभाविक शासक दल और परिवार करता चला।

जेएनयू में जो भारत के टुकड़े करने के नारे बुलंद कर रहे थे या शाहीन बाग में जो धर्मनिरपेक्षता का भोंडा नाच नाच रहे थे, मौजूदा विपक्ष केवल मोदी के विरोध के लिए उन तत्वों को महिमामण्डित कर  रहा था। अल्पसंख्यकवाद ने भारत की राज औऱ समाज नीति को कब अपना बंधक बना लिया यह राजनीतिज्ञों को पता ही नहीं चला। 2014 के बाद भारत अगर बदला हुआ नजर आता है तो इसके मूल में नरेंद्र मोदी भर नहीं हैं बल्कि ध्यान से देखें तो भारत के आत्मसम्मान के साथ किया गया बलात दुर्व्यवहार, हिकारत की प्रतिक्रिया ही मुख्य तत्व है। सूचना क्रांति ने भारत के करोड़ों नागरिकों के मन मस्तिष्क से उन जालों को हटाने का काम किया है जिसे वामपंथियों ने नकली दलीलों से पाठ्यक्रमों के जरिये, विमर्श नवीसी औऱ अन्य बौद्धिक गिरोहबंदी से खड़ा कर दिया था। ध्यान से देखा जाए तो भारत अब भारतबोध के साथ जीना सीख रहा है।

अमेरिका और पश्चिमी मीडिया के लिए भारत के हिन्दू तत्व औऱ दर्शन सदैव उसी अनुपात में हिकारत भरे रहे हैं जैसे कि भारत के सेक्युलरिस्ट इंटलेक्चुअल (वाम बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग) प्रस्तुत करता आया हैं। प्रथम यह कि मोदी के बगैर विदेशी मीडिया का भी गुजारा नहीं होता है दूसरा भारत को समझने और रिपोर्टिंग के लिए वामपंथी ही उनके पास अकेले स्रोत हैं।

 

 

टाइम ही नहीं बीबीसी, दी इकोनॉमिस्ट, न्यूयार्क टाइम्स, वाल स्ट्रीट जर्नल, वाशिंगटन पोस्ट, गल्फ न्यूज, एफ़वी, डीपीए, रॉयटर्स, एपी, गार्डियन जैसे बड़े मीडिया हाउस का भारतीय एजेंडा देश के उन्हीं बुद्विजीवियों द्वारा निर्धारित औऱ प्रसारित होता है जिनकी पहचान पिछले कुछ बर्षों में टुकड़े-टुकड़े, अवार्ड वापिसी और अफजल प्रेमी के रूप में सार्वजनिक हो चुकी है। मई 2014 के बाद से सरकारी धन औऱ स्वाभाविक शासक दल की सुविधाओं पर टिके रहने वाला यह बड़ा बौद्धिक गिरोह भारतीय लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के प्रति लोगों को भड़काने में  भी जुटा हुआ है। सुविधाओं से सराबोर लुटियंस से बेदखली ने इस गिरोह को इतना परेशान कर दिया है कि आज भारत के विरुद्ध खड़े होने में भी इन्हें संकोच नहीं है। वस्तुतः हिंदुत्व औऱ बाद में नरेंद्र मोदी के विरुद्ध सामरिक दुश्मन की तर्ज लंबा प्रायोजित अभियान चलाने के बाबजूद जनता द्वारा मोदी को राज दिए जाने के संसदीय घटनाक्रम ने इस वर्ग की कमर ही तोड़ दी है। 2014 के बाद 2019 में  मोदी की ऐतिहासिक जीत तो इनके लिए किसी पक्षाघात से कम नहीं है। ध्यान से देखा जाए तो भारतीय उदारवादियों ने बेशर्मी की सीमा को लांघकर दुनियां में भारत और हिंदुत्व को लांछित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

हिन्दू नेशनलिस्ट, हिन्दू तालिबान, हिन्दू रेडिकल, हिन्दू मर्डरर जैसी शब्दावली को सर्वप्रथम किसी विदेशी मीडिया ने नहीं बल्कि भारतीय वाम बुद्धिजीवियों ने ईजाद किया है। टाइम पत्रिका ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर 2012, 2015, 2019 में भी स्टोरी प्रकाशित की है और सबकी इबारत में हिन्दू शब्द अवश्य आया है। बीजेपी के लिए हिन्दू राष्ट्रवादी विशेषण लगाया जाता है। मानों हिन्दू औऱ हिंदुत्व कोई नाजिज्म का स्रोत हो। इस साल के अंक में पत्रिका के संपादक कार्ल विक लिखते है-‘लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष चुनाव होना ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि इससे केवल यही मालूम पड़ता है कि किसे अधिक वोट मिले हैं। भारत की 130 करोड़ आबादी में ईसाई, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध लोग रहते हैं, 80 प्रतिशत हिन्दू हैं, अब तक सभी प्रधानमंत्री हिन्दू ही हुए। मोदी ऐसे शासन कर रहे हैं जैसे औऱ कोई उनके लिए महत्व ही नहीं रखता। मुसलमान मोदी की हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी के निशाने पर हैं।’ पत्रिका आगे लिखती है

‘नरेंद्र मोदी सशक्तीकरण के वादे के साथ सत्ता में आये। उनकी हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा ने ना केवल उत्कृष्टता को बल्कि बहुलतावाद विशेषकर भारत के मुसलमानों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। दुनिया का सबसे जीवित लोकतंत्र अंधेरे में घिर गया है। सवाल यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी निर्वाचन प्रक्रिया से दो बार चुनकर आये मोदी को निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के बाद भी खारिज किया जाएगा? लोकतंत्र का झंडा लेकर घूमने वाले अमेरिकी मीडिया के लिए भारत में निष्पक्ष चुनाव की स्वीकार्यता कोई महत्व नहीं रखती है? क्या यह निष्कर्ष हमारे संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर ठीक वैसा ही आक्षेप नहीं है जो टुकड़े औऱ अवार्ड वापसी गैंग पिछले 6 बर्षों से स्थानीय विमर्श में लगाते आ रहे है। कभी ईवीएम, कभी वोट परसेंट, कभी चुनावी मुद्दों की विकृत व्याख्या औऱ हिन्दू ध्रुवीकरण जैसे कुतर्कों को खड़ा करके मोदी सरकार की स्वीकार्यता पर ही प्रश्नचिह्न यहां भी लगाये जाते है। क्या देश के सभी प्रधानमंत्रियों का हिन्दू होना भारत में अपराध है। क्या डेेमोक्रेट, रिपब्लिकन, लेबर, कंजरवेटिव पार्टियां ईसाई अस्मिता के धरातल पर नहीं खड़ी हैं? केवल बीजेपी को हिन्दू राष्ट्रवादी विशेषण लगाया जाना कुत्सित मानसिकता को प्रमाणित नहीं करता है? क्या अमेरिका, इंग्लैंड या यूरोप में गैर ईसाई राष्ट्राध्यक्ष बनते रहे है? चेक रिपब्लिक औऱ फ्रांस को छोड़ कितने देशों ने खुद को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर रखा है। इसलिए बुनियादी सवाल यही है कि क्यों भारत के सिर पर सेक्यूलरिज्म को थोपकर इसकी सुविधाजनक व्याख्या के आधार पर हमारे चुने गए प्रधानमंत्री को लांछित किया जाए। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि विदेशी मीडिया के पास क्या कोई अध्ययन और शोध मौजूद है जो यह प्रमाणित करता हो कि मोदी और बीजेपी मुसलमानों को निशाने पर ले रहे है? सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास मोदी सरकार का दर्शन रहा है। सरकार की फ्लैगशिप स्कीमों में प्रधानमंत्री आवास, उज्ज्वला, जनधन, हर घर शौचालय, सुकन्या, किसान सम्मान निधि, खाद्य सुरक्षा, मुद्रा में किसी हितग्राही को केवल मुसलमान होने पर बाहर किया गया हो ऐसा कोई भी उदाहरण आज तक सामने नहीं आया है। शैम्पेन के सुुरुर औऱ सिगार के छल्लों में बैठकर बनाई गईं प्रायोजित खबरें अक्सर तथ्य की जगह कथ्य का प्रतिबिम्ब होती है। भारतीय बुद्धिजीवियों ने इसी विधा से 60 साल तक शैक्षणिक, सांस्कृतिक, मीडिया संस्थानों पर राज किया है। मोदी और नया भारत इस अभिजन बौद्धिक विलास को खारिज कर चुका है इसलिए झूठी औऱ मनगढ़ंत प्रस्थापनाओं का अंतिम दौर आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उठ खड़ा हुआ है। टाइम औऱ दूसरे विदेशी मीडिया संस्थानों को शायद पता ही नहीं कि जिन बेपर्दा चेहरों के जरिये वे भारत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करते हैं उनका राजनीतिक और सामाजिक पिंडदान तो यहां पहले ही हो चुका है।

टाइम ने दुनियां के 100 ताकतवर व्यक्तियों में शाहीन बाग की 82 वर्षीय दादी बिलकिस बानो को जगह दी। इसकी इबारत लिखाई गई है राणा अयूब से। जी हां! वही राणा अयूब जो सार्वजनिक तौर पर मोदी, अमित शाह के विरुद्ध झूठ का प्रोपेगंडा चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में बेपर्दा हो चुकी हैं। ‘गुजरात फाइल्स-एनाटॉमी ऑफ ए कवरअप’ कूटरचना में इन्ही राणा अयूब ने हरेन पांड्या की हत्या की मनगढ़ंत कहानियां गढ़ी औऱ फिर एक जेबी एनजीओ से सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से जांच के लिए जनहित याचिका दायर कराई। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात फाइल्स को फर्जी, मनगढ़ंत, काल्पनिक बताकर खारिज कर दिया। दिल्ली दंगों के दौरान दो साल पुराना कोई वीडियो ट्वीट कर नफरत फैलाने के मामले में भी इन मोहतरमा का दामन दागदार रहा है। खुद को निष्पक्ष औऱ अंतरराष्ट्रीय स्तर का दावा करने वाली पत्रिका का बिलकिस को 100 ताकतवर शख्सियत में रखा जाना और राणा अयूब से ही उसके बारे में लिखवाना टुकड़े-टुकड़े गैंग औऱ पश्चिमी मीडिया के गठबन्धन को भी प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है। सभी जानते हैं कि शाहीन बाग का धरना अवैध था उस धरने में भारत के विरुद्ध षडयंत्र रचे गए। शरजील इमाम, उमर खालिद जैसे छात्र नेताओं ने भारत के चिकिन नेक काटने, ट्रम्प के दौरे पर अराजकता फैलाने से लेकर दिल्ली दंगों तक की पृष्ठभूमि तैयार की। अब तो सलमान खुर्शीद, योगेंद्र यादव जैसे लोगों के नाम भी दिल्ली दंगों को लेकर दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में सामने आ रहे है। नागरिकता संशोधन कानून का सबन्ध भारत के किसी मुसलमान से नही हैं यह सर्वविदित तथ्य है। एनआरसी का प्रारूप तब सामने नहीं था, लेकिन देश भर में झूठ और नफरत फैला कर मोदी अमित शाह के साथ भारत को बदनाम किया गया। इसी नकली औऱ प्रायोजित धरना प्रदर्शन की आइकॉन के रूप में राणा अयूब के जरिये टाइम ने बिलकिस को मोदी के समानान्तर जगह देकर अपनी चालाकी औऱ शातिरपन को खुद ही प्रमाणित कर दिया। राणा के हवाले से बिलकिस को लेकर लिखा गया है कि वो ऐसे देश में प्रतिरोध का प्रतीक बन गईं जहां मोदी शासन बहुमत की राजनीति द्वारा महिलाओं और अल्पसंख्यकों की आवाज को बाहर कर रही है। सवाल यह है कि क्या तीन तलाक के नारकीय दंश से मुक्ति दिलाने वाले मोदी राज में महिलाओं औऱ अल्पसंख्यकों के उत्पीडन का प्रामाणिक साक्ष्य किसी के पास उपलब्ध है? सिवाय अतिरंजित मॉब लिंचिंग घटनाओं के जो 130 करोड़ के देश में स्थानीय कानून की न्यूनता का नतीजा होती है जो अखलाख के साथ पालपुर में भी घटित होती है लेकिन शोर केवल अल्पसंख्यक औऱ उसमें भी मुसलमानों को लेकर खड़ा किया जाता है।

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