शौर्य और बुध्दिमत्ता की प्रतीक उत्तराखंड की नारी

समय की मांग है कि गांवों में रह रही अभावग्रस्त मातृशक्ति के हित में सरकार और समाजसेवियों द्वारा उसी ईमानदारी से पहल हो जैसी आजादी से पहले या उसके बाद के शुरुआती दौर में हो रही थी। परिस्थितियां थोड़ा भी अनुकूल हुईं तो पलायन के भयावह संकट पर भी काबू पाने का माद्दा रखती है उत्तराखंड की नारी। विषम आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों ने यदि यहां नारी के जीने की राह मुश्किल की है तो उनसे लड़ने का हौसला भी दिया है।

सामाजिक हितचिंतन के साथ ही वीरता और शौर्य की दृष्टि से उत्तराखंड की नारी के योगदान की बात करें तो पौराणिक काल से लेकर आज तक यह सूची लंबी होती गई है। उत्तराखंड की आदि नारी हिमालय पुत्री मां नंदा या पार्वती अपने दैवीय आचार-व्यवहार के कारण सनातनधर्मी भारतीय जनमानस में जगद्जननी के रूप में पूजित हैं। इतना दूर क्या- इसके बाद के युगयुगों को छोड़ते हुए पिछले मात्र सौ-डेढ़ सौ साल के कालखंड की ही बात करें तो वीरता से लेकर सामाजिक सांस्कृतिक चेतना और बुध्दिमत्ता के एक से एक उदाहरण उत्तराखंड की नारियों ने समाज के सामने प्रस्तुत किये हैं। संचार साधनों के अभाव में बेशक उनकी यशगाथा छोटे दायरे तक ही सिमटी रह गई हो, लेकिन मध्यकाल से लेकर प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध तक तीलू रौतेली, वीर वधू देवकी जैसी अनेक नारियों की पराक्रम और शौर्य गाथाएं कवि साहित्यकारों की लेखनी के साथ ही बद्दियों के हुड़के के साथ लोकगीत और गाथाओं के रूप में अपने इर्द-गिर्द के समाज के लिए प्रेरणा बन घर-घर प्रसरित होती रहीं। पवाड़ो (वीर गाथाओं) में स्थान पाने वाली तीलू रौतेली के नाम पर तो अब उत्तराखंड सरकार हर साल उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए किसी एक महिला को सम्मानित भी करती है। लेकिन सत्य घटनाओं पर आधारित मानी जाने वाली देवकी जैसी कई नारियों के त्याग, बलिदान और संघर्ष की गाथा बद्दियों से होते हुए तत्कालीन कवि-साहित्यकारों की अमर कृतियों के रूप में ही जनमानस तक पहुंची हैं। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान राठ के गोठ गांव का अमरसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ तो वैधव्य की पीड़ा भोगती उसकी पत्नी देवकी ने दीन-दुखियों की सेवा करते हुए अपना पूरा जीवन पति के नाम अर्पित कर दिया। उस दौर में काबुल के पठान गांवों में हींग बेचने आते थे। ऐसे ही एक पठान को दया भाव से देवकी ने अपने ओबरे (निचली मंजिल) में एक रात के लिए जगह दे दी लेकिन बदनीयत पठान ने आधी रात में पांडे (ऊपर की मंजिल) में सो रही देवकी का दरवाजा तोड़ दिया। खूंखार देवकी ने सिरहाने रखी खुंखरी से पठान को मार डाला। गढ़वाल के कवि, साहित्यकार, इतिहासकार भजन सिंह बिष्ट ने ‘सिंहनाद’ नाम से इस वीर वधू पर लंबी कविता लिखी है। जनश्रुति यह भी है चंडी बनी देवकी को खुंखरी समेत ही पौड़ी कचहरी लाया गया था जहां अंग्रेज न्यायाधीश ने वीरता के लिए उसे 500 रुपये ईनाम दिया था।

लोक में प्रचलित ऐसी अनेकानेक जनश्रुतियों से इतर उत्तराखंड के इतिहास, संस्कृति और समाज संदर्भित दस्तावेजों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उससे पहले थोकदार और राजशाही के काल में उत्तराखंड में अनेक जागरूक नारियां परिस्थितियों के मद्देनजर शासन की बागडोर संभालने के साथ ही सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना की प्रतीक बनकर इतिहास के पन्नों में अमर हो गईं। पति और पुत्रों को देश की रक्षा के लिए सन्नद्ध और अर्पित करने वाली वीर वधुएं और वीर माताओं ने जरूरत पड़ने पर पुत्रियों तक को युद्ध के मैदान के लिए सज्ज किया। तीलू की मां इसका बड़ा उदाहरण है। पिता, भाइयों और मंगेतर की हत्या का बदला लेने के लिए तीलू की मां ने ही उसे प्रेरित किया था। इतिहास के पन्नों में मध्यकाल से लेकर अंग्रेजों के दौर की राजशाही तक ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे जहां राजा या थोकदार की मृत्यु होने पर रानी ने अबोध बच्चों के लालन-पालन के साथ बहुत सूझबूझ से शासन की बागडोर भी संभाली। 17वीं शताब्दी में महाराजा महीपतिशाह के निधन के समय राज्य के उत्तराधिकारी पृथ्वीपतिशाह सात साल के थे। ऐसे में रानी कर्णावती ने राजकुमार के बड़े होने तक न केवल सत्ता संभाली बल्कि दिल्ली पर राज कर रहे मुगल बादशाह शाहजहां की आक्रमणकारी सेना को पराजित भी किया। कुशाग्र बुध्दि रानी ने कूटनीति का सहारा लेते हुए हार स्वीकार कर तय अवधि में 10 लाख रुपये नजराने के तौर पर दिल्ली भेजने का वादा भर किया। इस बीच मुगल सैनिकों की भोजन सामग्री समाप्त हो गई और वे बीमार पड़ने लगे तो मौका पाकर गढ़वाली सेना ने मुगल सैनिक मार गिराये। रानी ने बचे-खुचों सैनिकों की नाक कटवा दी। इसके बाद से कर्णावती ‘नाक कटी राणी’ के नाम से भी पुकारी जाने लगी। ऐसे ही टिहरी के राजा प्रताप शाह के 1886 में निधन के समय राज्य के उत्तराधिकारी राजकुमार कीर्तिशाह 12 साल के थे। इनकी माता महारानी गुलेरिया ने कुशाग्र बुध्दि राजकुमार का राज्याभिषेक कर छह साल के लिए पढ़ने के लिए बरेली और अजमेर भेज दिया और राज्य की बागडोर स्वयं संभाली। ऐसे ही गढ़वाल और कुमाऊं के वीर भड़ों की पत्नियों ने जरूरत पड़ने पर थोकदारी और रियासत को बचाने के लिए जी-जान लगा दी। कुमाऊं के पुरुख पंत को उसकी वीर मां ने युध्द में मारे गये अपने पति का बदला लेने के लिए प्रेरित किया था।

स्त्री शिक्षा के साथ ही समाजसेवा के क्षेत्र में अलग किस्म की जागरूकता उत्तराखंड में पुराने समय से ही दिखती रही है और इसके केंद्र में स्त्रियों की ही सबसे बड़ी भूमिका थी। अंग्रेजी शासनकाल में यह जागरूकता बढ़ती ही चली गई। चालीस के दशक में समाजसेवी मंगला देवी उपाध्याय ने टिहरी क्षेत्र में महिलाओं के उत्थान के लिए महिला मंडल की स्थापना की और शकुंतला देवी उनकी मुहिम का हिस्सा बनीं। इसी दौर में चंद्रावती पंवार जैसी महिलाएं अपने लेखन के माध्यम से अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के विरुध्द जनता को जागरूक कर रही थीं।

बेमेल विवाह, बाल विवाह और बहु-विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के चलते उत्तराखंड की नारी ने भी अंतहीन पीड़ा भोगी है। लेकिन इस स्थिति में अनेक स्त्रियों ने आत्मघाती कदम उठाने के बजाए समाज सुधारक की हैसियत से निष्ठुर और बीमार समाज को राह दिखाने के लिए कमर कसी। गढ़वाल के इतिहास में ऐसा एक नाम विध्यावती डोभाल ‘समाजपीड़िता’ का दर्ज है। कहते हैं कि बचपन में अपने से तीन-चार गुना बड़ी आयु के पुरुष से ब्याह दिये जाने की पीड़ा कभी नहीं भूल पाईं और पढ़-लिखकर अपना ‘समाजपीड़िता’ उपनाम रख महिलाओं की प्रेरणास्रोत बनीं। विध्यावती ने समाजसेवा के साथ आजादी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए हिंदी और गढ़वाली में कविता कहानियां रच समाज को नई राह दिखाई।

उत्तराखंड में महिला महंत और माईयों की गौरवशाली परंपरा रही है। अनेक माइयों ने संन्यासी के बाने में समाज सेवा की नायाब इबारत लिखी। ऐसा एक नाम है महंत नारायण गिरिमांई जिन्होंने बालिकाओं की शिक्षा के लिए बड़ी मुहिम चलायी। उन्होंने चालीस के दशक के उत्तरार्ध में रुद्रप्रयाग में एक बालिका विद्यालय और पचास के दशक के शुरुआती साल में छात्रावास खोला। ऐसे ही वैधव्य की पीड़ा भोग ससुराल और मायके से तिरस्कृत दीपा माई ने रो-धोकर जिंदगी काटने के बजाए समाज सुधार का बीड़ा उठाया। गढ़वाल के पौड़ी कोटद्वार क्षेत्र में साठ-सत्तर के दशक में शराब के खिलाफ अभूतपूर्व आंदोलन की अगुआ बन वह ‘टिंचरी माई’ नाम से प्रसिद्ध हो गईं। दीपा उर्फ टिंचरी माई से स्थानीय प्रशासन थर-थर कांपता था।

स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में टिहरी की महारानी कमलेंदुमति शाह का योगदान भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने 1962 अपने पति महाराजा नरेंद्र शाह के नाम पर टिहरी में नरेंद्र महिला विध्यालय की स्थापना की और उसी परिसर में नेत्रहीन बच्चों के लिए भी विद्यालय खोला। टिहरी में ही सास महारानी नेपालिया के नाम से कन्या पाठशाला खोली। कमलेंदुमती शाह समाज सेवा के लिए पद्मभूषण से सम्मानित हुईं। महिलाओं की इस जागरूकता का ही परिणाम है कि साक्षरता के लिहाज से उत्तराखंड की गिनती आज देश के शीर्ष राज्यों में होती है।

स्वरोजगार के क्षेत्र में भी दशकों पहले कई महिलाओं ने पारंपरिक हुनर को क्षेत्रीय संसाधनों के बल पर बढ़ाते हुए अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये। यह अलग बात है कि सरकारों की उदासीनता के कारण एक से एक क्षेत्रीय हुनर आज बेदम हो चुके हैं। पिथौरागढ़ के भोटिया व्यापारी परिवार की तुलसीदेवी ने 1946 में गांधी जी की शिष्य सरला बेन के ‘लक्ष्मी आश्रम’ से प्रेरणा लेकर 1952 में कताई बुनाई केंद्र खोला और बेसहारा लोगों को ऊन कताई और बुनाई का प्रशिक्षण देकर स्वावलंबी बनाया। गौरतलब है कि आजादी के आंदोलन के दौरान सरला बेन की भी बड़ी कर्मस्थली था उत्तराखंड। अस्सी के दशक तक क्षेत्रीय स्तर पर कई राजनीतिक पदों पर मनोनीत होती रहने वाली तुलसी देवी ने स्त्रियों को शिक्षा के प्रति प्रेरित करते हुए स्वावलंबी बनाने के लिए ऋण की सुविधा भी दिलाई। उन्होंने कौसानी में ‘लक्ष्मी आश्रम’ संस्था का गठन किया। इस आश्रम से जुड़ी कमला व बसंती देवी ने बदरी केदार क्षेत्र में नया ग्राम सेवा केंद्र खोला जहां लघु और कुटीर उद्योगों की ट्रेनिंग दी जाती थी। समाजसेवियों में एक नाम टिहरी की रेवती उनियाल का भी है जिन्होंने श्रीनगर को कर्मस्थली बनाते हुए बालिकाओं की शिक्षा के लिए बड़ी मुहिम चलाई और रेडक्रास के सेक्रेटरी रहीं। रेवती ने सर्वोदयी नेताओं के सहयोग से चरखा संघ खोल क्षेत्रीय लोगों को रोजगार से भी जोड़ा।

आजादी के आंदोलन में महिलाओं के योगदान की बात करें तो बागेश्वर की बिशनी देवी शाह का नाम शीर्ष पंक्ति में विराजमान है। उनसे प्रेरित दुर्गादेवी, भक्तिदेवी, कुंतीदेवी, जीवंती देवी, भगीरथी देवी और रेवतीदेवी जैसी अनेक नारियां आजादी के आंदोलन में कूद पड़ीं। आचार्य नरेंद्रदेव, पं. जवाहरलाल नेहरू और विजयलक्ष्मी पंडित जैसे नेताओं की प्रेरणा के बल पर बिशनी देवी जैसी महिलाएं जेल जाने से नहीं हिचकीं। आजादी के प्रतीक ध्वज को सरकारी भवनों या सार्वजनिक स्थलों पर फहराना उनकी मुहिम का अहम हिस्सा था। देश में खादी का प्रचार करते हुए महिलाओं को स्वावलंबी बनाने की बड़ी मुहिम भी बिशनी देवी शाह ने चलाई।

युगों से शौर्य, साहस और बुद्धिमत्ता की प्रतीक रही उत्तराखंड की नारी समय के साथ कदमताल करते हुए आज भी नई-नई उपलब्धियां अपने खाते दर्ज कर रही हैं। ऐसे में समय की मांग है कि गांवों में रह रही अभावग्रस्त मातृशक्ति के हित में सरकार और समाजसेवियों द्वारा उसी ईमानदारी से पहल हो जैसी आजादी से पहले या उसके बाद के शुरुआती दौर में हो रही थी। परिस्थितियां थोड़ा भी अनुकूल हुईं तो पलायन के भयावह संकट पर भी काबू पाने का माद्दा रखती है उत्तराखंड की नारी। विषम आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों ने यदि यहां नारी के जीने की राह मुश्किल की है तो उनसे लड़ने का हौसला भी दिया है।

 

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