पर्व त्यौहारों की विविधता है भारत की पहचान

पोंगल,जल्लीकट्टू,कम्बाला,पोळा,सोहराय,सोनहाना आदि आदि परब त्योहार पशुधन को समर्पित परब है जो कृषि प्रधान भारत वर्ष को विविधता के साथ संस्कृति के एक सूत्र में बाँधने का काम करता है।.. कोई एक साथ ही दीपावली मना रहा तो कोई सोहराय तो कोई काली पूजा, तो कोई कुछ और, कहीं कोई समस्या नहीं। पश्चिम में गणेश जी की धूम है तो पूर्व में दुर्गा,काली की.. उत्तर में राम,शिव है तो दक्षिण में अयप्पा और मुरुगन स्वामी का.. कहीं कोई टकराव नहीं। और बीच में बिशु,करम,जितिया,मकर,आखाइन,दंसाय,छठ,चैती जैसे सैकड़ों परब त्योहार आते जिसमें कहीं कोई समस्या नहीं कोई दुत्कार नहीं। किसी ने ये नहीं टोका कि ये मत करो वो मत करो,सभी ने एक दूसरे के परब त्योहार को सम्मान ही दिया और सदैव ही दिया,किसी ने भी अपने परब संस्कृति को ऊँचा कहकर सामने वाले को नीचा दिखाना का प्रयास नहीं किया। यही तो बोर-ओत (भारत) है,यही तो भारतीयता है और यही तो भारतीय संस्कृति है।
विविधताओं में भारतीयता निहित है। कृषि प्रधान भारत में विभिन्न क्षेत्रों में कृषि के दौरान और उनके विकास के दौरान स्वतः उपजे पर्व त्योहार ही भारतीयता को परिभाषित करते हैं। ये यहीं के मिट्टी में उपजी संस्कृति है,कहीं बाहर से आयात न किया गया। और जो भारतीय वरदानी मिट्टी में उपजी संस्कृति है उन्हीं में सब समाहित करने की क्षमता है अन्य किसी में नहीं। यहीं की संस्कृति में एक दूसरे के प्रति सम्मान है,प्यार है और स्वीकार्यता है। अंधाधुंध हजारों आक्रमण के बावजूद भी सबसे प्राचीनतम संस्कृतियों में जो अब तक भी जीवंत है भारत में ही है। अन्यत्र कहीं दुर्लभ सी जान पड़ती है। अन्यत्र बस 2,000 साल पुरानी चीजें ही प्राचीनता के घेरे में आती है।
भारत भूमि में हमने जिस जीवट और उत्कृष्ट संस्कृति को खड़ा किया विकास किया ये उन्हीं की शक्ति है कि हम अब तक भी भारतीय बने हुए हैं,अपनी संस्कृतियों में जी रहे हैं व आगे की संततियों में बढ़ा भी रहे हैं। क्या संस्कृति के मामले में ऐसी जीवटता कहीं और हम देख पाते हैं ?? बर्बर सभ्यताओं से निकली संस्कृति और रिलीजन ने विश्व संस्कृति का कितना सम्मान किया है ?? ये जहाँ भी गए क्या वहाँ की प्राचीन संस्कृति अब सांस ले पा रही है ? उनका अपने लिए कुछ अपना कहने भर का कुछ शेष बचा है ?? अपनी ऐसी कौन सी चीज है जिसपे वे गर्व कर सकते हैं ??थोपी हुई या आयात की हुई चीजें आपके मूल को मार देती है। आपकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम करती है। कुछेक वर्षों में ही आपके जड़ पूर्णतः सड़ जाते हैं। फिर आप सहस्र वर्षों से सिंचित व पल्लवित वृक्ष का एक जड़विहीन सूखा ठूठ बन कर खड़े रह जाते हैं जिसके ऊपर तरह-तरह के झालर लगा दिए जाते हैं और तब आप उस झकमक करती झालरों में ही गर्व करने लगते है, गौरवशाली पल्लवित प्राचीनता को भूलकर कृत्रिम टिमटिम करती शाखाओं से उन्हें ढंकने का प्रयास करते हैं व आधुनिकता का चोला पहना कर उसे श्रेष्ठ साबित करने का कुत्सित प्रयास करने लग जाते हैं।
आयातित संस्कृतियों में यही गुण है.. सम्मान व स्वीकार्यता नहीं। जो इसमें पूर्ववत है उसे ही ग्रहण करना है और अपनी चीजों का त्याग करना है। और कुछ समय पश्चात अपनी चीजों को गाली देते हुए जो तुम्हें यहाँ तक ले के आया को नीचा दिखाना है, उसे अपने में समाहित करना है , हर वो चीज अपनाना है जिससे कि सब कोई इनके खेमे में आये और न माने तो खून के बहाव के लिए कोई मनाही नहीं है।
जो परिवर्तित है क्या उन्हें अपने सहोदरों द्वारा हर्षोल्लास के साथ मनाए जा रहे परब-त्योहारों को देख कर टीस नहीं उठती है ?? नहीं सोचते कि हम इतने धनी संस्कृति को छोड़ कर किसी रेगिस्तानी संस्कृति को जबरन ढोये जा रहे हैं ?? जबरदस्ती का गर्व किये जा रहे हैं ?? बेकार का श्रेष्ठ साबित करने में तुले हुए हैं ?? हमारे पाँच-छः पीढ़ियों ने जो गलती करी उसे हम अब तक भी क्यों ढोये जा रहे है ??
ऐसे प्रश्न उन्हें हम जिस दिन सोचने को विवश कर देंगे,यकीन मानिए उस दिन से पुनः भारत भारत की ओर लौटना प्रारंभ कर देगा।
– संघी गंगवा

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