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वर्तमान समय में भारतीय कृषि हरित क्रांति के समय की अपेक्षा ढांचागत स्तर पर अलग तथा मजबूत है। यहां कुछ ऐसा है जो हमें भारतीय कृषि के प्रति आशान्वित करता है।

जर्मनी की राजनीतिक विज्ञानी एलिजाबेथ नेवेल नुमानन ने ‘चुप्पी का वर्तुल‘ नामक सिद्धांत पेश किया है, जिसका माने है कि, ‘यदि बहुसंख्यक किसी तरह किसी विशेष सोच में विश्वास करने लगते हैं तो विद्वान लोग चुप्पी की राह पर चले जाते हैं। फिर, यह एक नई दिशा की ओर प्रभावी तरीके से दृष्टिपात करते हुए आदर्श के रूप में उभरता है।

‘चुप्पी का वर्तुल‘ सिद्धांत सामान्यतः भारतीय कृषि के बनिस्बत आम आदमी की राय को व्याख्यायित करता है- एक आदिम, पिछड़े, गैर व्यावसायिक, संकट प्रवण और आर्थिक उन्नति के मार्ग के अवरोधक के तौर पर। मजबूत व मुखर विचार, देश के भीतर और बाहर के जनमानस के मन में पूरी तरह बैठ चुका है। परंतु सत्य बिलकुल उलट है। भारतीय कृषि रचनात्मक दृष्टि से अलग है तथा इस समय हरित क्रांति युग से अधिक मजबूत स्थिति में है। 1970 के दशक की शुरुआत से लेकर 90 के दशक के अंत तक भारतीय कृषि का सकल घरेलू उत्पाद 24 बिलियन डॉलर से बढ़कर 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचा था। उस समय न केवल विकास की गति सुस्त थी बल्कि पूरी तरह अनाज जैसे कि चावल व गेंहू पर आश्रित थी। वहीं 2000 और 2014 के बीच देश का कृषि उत्पाद 101 बिलियन डॉलर से बढ़कर 367 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, मुख्यतः बागवानी, दुग्ध, कुक्कुट पालन एवं अंतर्देशीय मत्स्यिकी की बदौलत। दुनिया में कोई और देश भारत जितनी मात्रा में खाद्य व गैर खाद्य फसलों का उत्पादन नहीं करता है। इसके अतिरिक्त हमारे छोटे-छोटे पारिवारिक खेत अपनी तरह के मिश्रित कृषि-बागवानी-पशुपालन युक्त कृषि का कार्य करते हैं। यह वास्तव है कि खेतिहर किसान दुग्ध उत्पादन, बकरी पालन, मुर्गी पालन या जल के उत्पादों द्वारा अपनी आमदनी को दुगुना कर रहे हैं। उच्च क्षमता के बीज, खाद, कीटनाशक, कृषि उपकरण, किसानों के लिए उपयोगी नए उपकरणों, बेहतर सड़कों तथा संचार व्यवस्था ने भी भारतीय किसानों को वैश्विक नेतृत्वकर्ता के तौर पर सामने लाकर खड़ा कर दिया है।

2014 में 8 प्रतिशत वैश्विक भागीदारी के साथ कृषि उत्पाद के क्षेत्र  में भारत का दूसरा स्थान (चीन का प्रथम) रहा जबकि बहु प्रचारित सेवा क्षेत्र में 2 प्रतिशत भागीदारी के साथ 11हवां स्थान रहा। निर्माण उद्योग में तो और बुरी स्थिति रही। यहां पर बारहवां स्थान रहा।

भारत का सबसे बड़ा गैर सरकारी क्षेत्र, कृषि, देश के समूचे कार्य बल के आधे लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है। यह श्रम घनिष्ठ कृषि क्षेत्र है जिसने भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को बनाया है जबकि सेवा एवं निर्माण उद्योग पूर्णतया फिसड्डी रहे हैं।

जब हम उत्पादन अथवा दक्षता का आकलन करते हैं तो भारत के लिए स्वीकार्य बेंचमार्क ‘कुल उत्पादन‘ होना चाहिए। वे सभी चीजें जो किसी जमीन से पैदा होती हैं, मसलन अनाज, फल, सब्जियां, चारा, दूध, अंडे, मछली, मांस, खाद, शहद या इमारती लकड़ी।  जबकि इसका आकलन केवल ‘फसल उत्पादन‘ के तौर पर लगाया जाता है जो कि एक एकल फसल के प्रति यूनिट क्षेत्र का उत्पादन  करने के लिए संदर्भित करता है। बाद के प्रकार की उच्च पैदावार आम तौर पर पश्चिमी अर्थशास्त्र के इनपुट-गहन औद्योगिक मोनोकल्चर फार्मिंग सिस्टम में तब्दील हो चुकी है।

भारत में ज्यादातर खेत सीमांत तथा छोटे अर्थात् दो हेक्टर से कम के हैं। ज्यादा लाभ की व्यावसायिक आवश्यकता के कारण इन छोटे खेतों ने कई प्रकार की फसल उपजाने की तकनीक अपनाई है। फसल की कटाई और पशुपालन के सह-अस्तित्व के कारण साल भर आर्थिक गतिविधि बनी रहती है। प्रति इकाई क्षेत्र के हिसाब से कुल कृषि उत्पाद के मामले में वैश्विक स्तर पर भारत का स्थान  सर्वोच्च है। कृषि को अपेक्षाकृत लचीला, जीवंत और अनिश्चितताओं के प्रति कम असुरक्षित बनाते हुए भारत के खेत प्रत्येक इकाई में गुणात्मक उत्पाद करते हैं।

2015 में 146 मिलियन टन दूध का उत्पादन कर भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बन गया है। इसमें से 99 प्रतिशत आपूर्ति छोटे उत्पादकों द्वारा की जाती है। अनाज और फलियों से मिलने वाला पशुओं का चारा, आलू के सूखे तने, गन्ने की पत्तियों, फलों व सब्जियों के अवशेष को खेतों से पैदा होने वाले हरे चारे के साथ मिलाकर अपने पशुओं को खिलाते हैं। घर के पीछे पाले जाने वाले पशुओं तथा कुक्कुट के छोटे झुंड महत्त्वपूर्ण घरेलू सम्पत्ति होते हैं। इनसे मिलने वाला दूध और अंडा फसलों से होने वाली मुख्य आमदनी के इतर लगातार होने वाली आमदनी का प्रमुख स्रोत है।

भारत के खाद्य उत्पादन और उसके खपत की पद्धति भी काफी अनूठी है। दुनिया भर में खाद्य अनाज की अपेक्षा चारे में इस्तेमाल किए जाने वाले अनाज की ज्यादा पैदावार होती क्योंकि लोगों की खाद्य पद्धति मांस पर आधारित है। 2015 में दुनिया भर में 2528 मिलियन टन मांस की खपत हुई जो खाद्य खपत का 55 प्रतिशत था। विकसित देशों में 70 प्रतिशत अथवा उससे ज्यादा अनाज चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। विश्व में मांस की प्रति व्यक्ति खपत 43 किलोग्राम है तथा अमेरिका का 100 किलोग्राम से ऊपर है। वहीं भारत में मांस की प्रति व्यक्ति खपत मात्र 4 किलोग्राम ही है। यहां पर ‘मांस विहीन भोजन‘ सामान्य सी बात है। इसलिए अनाज, सब्जियों, फल और दूध पर आधारित भारत का खाद्य उत्पादन एवं खपत निहित हैं। हमारे अनाज उत्पादन में चारे के अनाज का प्रतिशत मात्र 15 है।

वर्तमान समय में मुख्य फसलों चावल व गेहूं के 198 मिलियन टन की अपेक्षा 256 मिलियन टन के साथ फलों व सब्जियों का उत्पादन काफी आगे निकल चुका है। यहां तक कि भारत के बाहर के खाद्य बाजार के 312 बिलियन डॉलर के व्यापार में 101 बिलियन डॉलर के साथ एक तिहाई हिस्से पर फल और सब्जियों की भागीदारी हो चुकी है, साथ ही दूसरे स्थान पर 74 बिलियन डॉलर की दूध और अंडे की भागीदारी। 61 बिलियन डॉलर के साथ मुख्य फसलों की भागीदारी तीसरे स्थान पर खिसक चुकी है जबकि मांस का हिस्सा केवल 14 बिलियन डॉलर रह गया है। भारतीय कृषि भी वैश्विक स्तर पर प्रतियोगी होने योग्य है, इस बात पर जोर दिए जाने की आवश्यकता है। कुल माल निर्यात के मामले में भारत का 19वां स्थान है, जबकि कृषि आधारित निर्यात के मामले में इसका 9वां स्थान है। भारत उन इकलौते देशों में से है जहां आज भी एक डॉलर में एक दर्जन केले अथवा अंडे मिल सकते हैं। हमारे कृषि आधारित निर्यात को आसानी से बढ़ाकर 2.35 प्रतिशत से 10 प्रतिशत तक किया जा सकता है, बशर्ते उचित नीति, हस्तक्षेप तथा आक्रामक मार्केटिंग की जाए।

भारत की फसल-पशुपालन आधारित कृषि व्यवस्था पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन सकती है। कम लागत और विविध खेती आधारित प्रणाली भारत को विश्व में उसके सही स्थान अर्थात् नेतृत्वकर्ता के स्थान पर ला सकती है। भारत की कृषि को कमजोर आंकना ‘चुप्पी का वर्तुल‘ के आधार पर है, कि अनुभवजन्य आवाजों पर। मैं विश्व बैंक की एक टिप्पणी से समाप्त करना चाहूंगा: ‘भारत पूरी तरह अनाज के आयात पर आधारित जीर्ण-शीर्ण व्यवस्था से बाहर निकलते हुए लैंडमार्क कृषि क्रांति के द्वारा विशुद्ध निर्यातकों की श्रेणी में आ खड़ा हुआ है।‘

 

 

 

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