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डॉ. अच्युत सामंता उड़ीसा के शिक्षा-पुरुष

डॉ. अच्युत सामंता उड़ीसा के शिक्षा-पुरुष हैं। उन्होंने अभावग्रस्त वनवासी छात्रों की सामान्य और टेक्नालॉजी दोनों की शिक्षा के लिए विशाल परिसर स्थापित किया, जो देश-विदेश के लिए अनूठा उदाहरण हैं। यह एक ज्ञानतीर्थ ही है, जहां आज हजारों छात्र शिक्षा ग्रहण कर सफलता के नए आयाम रच रहे हैं।

तुलसी ने मानस में धर्म की अद्भुत व्याख्या की है, जो आज के समय में सबसे अधिक सभीचीन है कि- पर हित सरिस धर्म नहि भाई। पर पीड़ा सम नहि अधभाई। अर्थात दूसरों की भलाई करने जैसा कोई धर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा, दुःख पहुंचाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है। आज के संदर्भ में, जबकि धर्म के नाम पर हिंसाचार, अत्याचार, आंतकवाद तथा अलगाववाद के बीज बोए जा रहे हैं, इस व्याख्या से अधिक श्रेष्ठ धर्म की व्याख्या कोई हो नहीं सकती किन्तु, केवल जबानी जमाखर्च या सैद्धांतिक व्याख्या से समाज या व्यक्ति का भला नहीं होता, बल्कि समाज या व्यक्ति का भला तब होता है, जब इस व्याख्या को कोई महापुरूष अपने सत्कर्म से उसे व्यवहार में बदल दे और उसका सुपरिणाम पूरे समाज को प्राप्त होने लगे।

इस कृति स्वरूप धर्म के दर्शन का ऐसा ही एक अवसर हम सब लोगों के जीवन में तब आया जब उड़ीसा के किस-किट संस्थान के संस्थापक और कुलपति, राज्यसभा सदस्य डॉ. अच्युत सामंता के स्नेहपूर्ण आमंत्रण पर श्री भागवत परिवार, मुंबई के 24 सदस्यों का एक दल श्री भागवत परिवार द्वारा सद्य प्रकाशित अप्रतिम भारत ग्रंथ के विमोचन के अवसर पर उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर पहुंचा था। दि. 6 जुलाई 2018 को दोपहार के लगभग 1.30 बजे हम सबका विमान भुवनेश्वर हवाई अड्डे पर उतरा, बाहर निकले तो स्वयं सामंता तथा उनके सभी कार्यकर्ताओं ने हम सबका ऐसा स्वागत किया, जिसकी हमें कल्पना भी नहीं थी। भावपूर्ण स्वागत से अभिभूत हम सब किस-किट (किस याने कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सायंसेस तथा किट याने कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रीयल टेक्नोलॉजी) के भव्य अतिथि गृह में पधारे, उस अतिथि गृह के सभी कर्मचारियों एवं स्वयंसेवकों का व्यवहार हम सभी लोगों को एक अलग ही अनुभव दे गया।

निश्चित समय पर हम सभी श्री भागवत परिवार के सदस्य भुवनेश्वर के भव्य मेफेयर कन्वेंशन सभागार में पहुंचे, जहां उड़ीसा के राज्यपाल समादरणीय प्रो. गणेशी लाल जी के करकमलों द्वारा अप्रतिम भारत ग्रंथ का विमोचन होने वाला था। निश्चित समय दोपहर के 4.30 बजे राज्यपाल महोदय का आगमन हुआ। राष्ट्रगान और दीप प्राकट्ट्य से कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। मंच पर राज्यपाल के अतिरिक्त डॉ. अच्युत सामंता, उड़ीसा साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर पद्म विभूषण श्री सीताकांत महापात्र, उड़ीसा के सचिव एवं संस्कृति निदेशक श्री विजय कुमार नायक, आई.ए.एस., डॉ. सामंता के आध्यात्मिक गुरू बाबा रामनारायण दास जी महाराज, उड़ीसा पत्रिका पौरूष के सम्पादक तथा जगन्नाथ संस्कृति के अध्येता श्री असित कुमार मोहंती, श्री भागवत परिवार के अध्यक्ष श्री एस.पी.गोयल विराजमान थे। कार्यक्रम का संचालन, राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित, श्री अशोक पांडेय कर रहे थे।

डॉ. अच्युत सामंता ने अपने स्वागत भाषण में सभी अतिथियों का अभिनंदन- स्वागत करते हुए कहा कि आज उड़ीसा जो पूर्व में स्थित है, वहां भारत के पश्चिम में स्थित महाराष्ट्र के प्रकाशित ग्रंथ का लोकार्पण भारत की कालजयी सांस्कृतिक एकता और एकात्मता का श्रेष्ठतम उदाहरण हैं।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता श्री सीताकांत महापात्र ने अपने अध्यक्षीय भाषण में भारत की अप्रतिम- अद्वितीय अलौकिक चिंतन परंपरा के प्रतिनिधि के रूप में अप्रतिम भारत ग्रंथ को बताया, तथा इस परंपरा को सतत् आगे बढाते रहने का आशीर्वाद दिया।

अप्रतिम भारत ग्रंथ का विमोचन करते हुए आदरणीय राज्यपाल प्रो. गणेशी लाल जी ने भारतीय संस्कृति की सनातनता तथा उसकी गौरवशाली परंपरा पर अपने विद्वत्तापूर्ण सम्बोधन में सभी का आवाहन किया कि यह हम सब का कर्तव्य है कि आज के संदर्भ में हम अपने जीवन मूल्यों और संस्कार को व्यवहार में लाएं ताकि मानवता पोषित हो सके। श्री एस. पी. गोयल ने सभी का आभार व्यक्त किया और पुनः राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। भुवनेश्वर के आंगन में सांझ उतर रही थी। भगवान भुवनभास्कर अस्तांचलगामी हो रहे थे। किन्तु हम सब एक ऐसे ज्ञानतीर्थ का दर्शन करने के लिए लालायित हो रहे थे जहां डॉ. अच्युत सामंता ने अपने पुरूषार्थ से वनवासी- आदिवासी निर्धन छात्र-छात्राओं के लिए ज्ञान का सूर्योदय किया था।

ये शिक्षा संस्थान संक्षेप में किस और किट के नाम से जाने जाते हैं। किस संस्थान पूर्णतः वनवासी आदिवासी क्षेत्र के छात्र-छात्राओं का विश्वविद्यालय हैं और किट संस्थान सामान्य विद्यार्थियों के लिए बनाया गया शिक्षा संस्थान है, जिसमें सभी विषयों की पढ़ाई की जाती हैं, इसे विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है।

उपयुक्त दोनों ही संस्थान भुवनेश्वर शहर से लगभग 12 कि.मी. की दूरी पर लगभग 460 एकड के विशाल संकुल में स्थापित हैं। किस संस्थान डॉ. अच्युत सामंता का संपूर्ण राष्ट्र को ऐसा अवदान है, जिसके लिए सारा देश उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगा। डॉ. सामंता उड़ीसा के छोटे से गांव में जन्मे, गरीबी और बेबसी में पले-बढ़े और अपने पुरूषार्थ तथा परिश्रम से स्वयं के व्यक्तित्व को गढ़ने वाले ऐसे सेवापुरूष हैं, जिनकी प्रेरणा सदैव उनकी पूज्य माता श्रीमती नीलिमारानी रही ंहैं और जिनके आराध्य- इष्ट श्री हनुमानजी हैं। आज उनके सामर्थ्य का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके किस संस्थान में उड़ीसा तथा भारत के दूरदराज वनवासी क्षेत्र के 27,000 छात्र-छात्राएं निःशुल्क अध्ययन कर रहे हैं, जिनके आवास-निवास, भोजन, गणवेश, अध्ययन तथा अर्थार्जन की व्यवस्था एक छत के नीचे संस्थान द्वारा सुनिश्चित की जाती हैं। 100 एकड़ के विशाल परिसर में निर्मित किस संस्थान, जिसका परीक्षा परिणाम 100% रहता है जिसके 43 वनवासी छात्रों ने पीएच. डी. के लिए अब तक राजीव गांधी राष्ट्रीय फेलोशिप प्राप्त की है। हर वर्ष जिनके छात्रों का चयन आई.आई.टी., आई.आई.एम. तथा मेडिकल में होता हैं। उपलब्धियों की एक लंबी सूची है किस के विद्यार्थियों की। परिसर ऐसा स्वच्छ और रमणीय कि आपका वहां से जाने को मन ही न करे। चारों तरफ हरियाली, हमें ढूंढ़ने पर भी कहीं गंदगी या कचरा नहीं मिला। क्या कहेंगे इसे आप- सिर्फ यही कि यदि व्यक्ति ठान लें तो कुछ भी असंभव नहीं है। किस के संकुल में स्वयं की बेकरी है, गणवेश की सिलाई के लिए सैकड़ों सिलाई मशीनें हैं, सौर ऊर्जा है, वाई-फाई है, जिम है और सबसे अधिक वहां हर एक शिक्षक- कर्मचारी स्वयंसेवक में सेवा और समर्पण का भाव है। भागवत परिवार के सभी सदस्य विस्मित थे, चकित थे और डॉ. सामंता के पौरूष और उनकी मानवता के प्रति उनके समर्पण भाव के प्रति श्रदावनत थे आज यदि उड़ीसा में नक्सलवादी आंदोलन पर लगाम लगी है तो वह  इसलिए कि वहां के हर ग्राम में अच्युत सामंता ज्ञानदीप से वहां के बच्चों के भविष्य को संवार रहे हैं। डॉ. सामंता का एक ही सूत्र वाक्य है कि शिक्षा के प्रसार से गरीबी और असमानता के दुष्चक्र को तोड़ो और प्रेम तथा सद्भाव से सबको जोड़ो।

आज किस -संस्थान को यू जी सी द्वारा विश्वविद्यालय की मान्यता दी गई है और संयुक्त राष्ट्र संघ के युनेस्को ने इसे विश्व का प्रथम जनजातीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया है। डॉ. सामंता द्वारा वर्ष 1992 में भुवनेश्वर के एक किराए के मकान से मात्र 125 विद्यार्थियों से शुरू किए गए इस शिक्षा संस्थान को आज विश्व में जो प्रतिष्ठा मिली है, उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं है। अब तक इस संस्थान में 22 देशों के राजदूत तथा उच्चायुक्तों का आगमन हो चुका है। परम पावन दलाई लामा, पूज्य शंकराचार्य, श्री श्री रविशंकर, अनेकानेक केन्द्रीय मंत्री, तथा अन्य शिक्षाविद्ों तथा विचारकों ने इस संस्थान को देखकर इसे विश्व के अभिनव ज्ञानतीर्थ की संज्ञा दी है।

डॉ. सामंता का सपना है कि आगे आने वाले समय में इस संस्थान में उड़ीसा तथा भारत के विभिन्न वनांचलों के 2 लाख विद्यार्थियों को यह सुविधा उपलब्ध कराए। आज इस संस्थान के हजारों कर्मचारी, 1800 शिक्षक तथा 27000 छात्र-छात्राएं दूसरे देशों के लिए भी अध्ययन और शोध का विषय बन चुके हैं। अमेरिका के फुलब्राइट अध्येता तथा समाजसेवा विज्ञान के प्रोफेसर क्रिस्टिन फिननू ने इस संस्थान का सांगोपांग अध्ययन करने के लिए स्वयं को समर्पित किया है।

लगभग तीन घंटे तक किस- संस्थान के विभिन्न संकार्यो को देखना अपने आप में आनंद देने वाला था। वहां का रसोईघर, जिसमें एकसाथ आठ से दस हजार विद्यार्थी जमीन पर बैठ कर भोजन करतें हैं। सभी विद्यार्थियों की जगह निश्चित, समय निश्चित और उनकी सेवा निश्चित होती है। विद्यार्थी ही विद्यार्थी को परोसते, खिलाते हैं और उनका ध्यान भी रखते हैं। ऐसा सौहार्द सद्भाव और सहयोग सभी छात्र-छात्राओं के बीच चाहे वह किसी भी जन जाति-वनक्षेत्र के हों, सब को एक रखता हैं।

हमें यह जानकर और भी अधिक प्रसन्नता हुई कि किस संस्थान के एक छात्र रनजीत नायक ने वर्ष 2016 के रियो ओलम्पिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। किस के छात्र- छात्राओं ने 14 वर्ष के कम उम्र के छात्रों की रग्बी विश्व चैम्पियनशिप लगातार तीन बार जीती है। हमारे साथ चल रहे किस-किट के आर.एन. दास बता रहे थे कि किस- संस्थान विश्व के 500 एन. जी. ओ. तथा भारत के सर्वोच्च 10 एन. जी. ओ. में अपना स्थान रखता है।

किस संस्थान जहां गरीब वनवासी- जनजातीय छात्र- छात्राओं को निःशुल्क शिक्षा प्रदान कर रहा है, वहीं किट-संस्थान अर्थात कलिंग इंस्टिट्यूट ऑफ इण्डस्ट्रियल टेक्नालाजी सामान्य विद्यार्थियों के लिए है जिसे डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है। इसकी विशेषता यह है कि इसके 23 अलग-अलग कैम्पस (परिसर)  हैं। सभी कैम्पस अपने-आप में स्वतंत्र और स्वावलम्बी हैं। सभी में सभी प्रकार के अध्ययन की सुविधाएं, छात्रावास तथा खेल आदि की अत्याधुनिक सुविधाएं हैं किन्तु जो उल्ले्नीय बात है वह यह कि किट का प्रत्येक कर्मचारी / व्याख्याता / प्रोफेसर अपने वेतन की 3% राशि किस – संस्थान को दान देते हैं। दूसरा, किट संस्थान अपने कुल टर्न-ओवर की 5% राशि सामाजिक सेवा के दायित्व के अंतर्गत किस संस्थान को दान रूप में देता है। तीसरा, किट संस्थान के जितने ठेकेदार / कांट्रेक्टर / वेंडर हैं, जो किट परिसर में अपना व्यापारिक प्रतिष्ठान चलाते हैं वे अपनी कमाई का 2 से 3% दान किस को देते हैं। चौथा- प्रति वर्ष किस संस्थान को विभिन्न कारपोरेट संस्थानों/ संस्थाओं से रू.1500 करोड़ का अंशदान प्राप्त होता है। इस सिद्धांत के आधार पर किस और किट संस्थान ने ज्ञान के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

कहना होगा कि डॉ. सामंता ने एक असंभव से लगने वाले कार्य को अपने दूरदर्शी सरल सहज और कल्पनाशील नेतृत्व से संभव कर दिखाया है। जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है।

और केवल यहीं नहीं, जिस कलारबंक गांव में उनका जन्म हुआ था और जहां गरीबी और अभाव का दंश सहकर जवान हुए थे उनके प्रयत्नों से वह गांव आज देश का पहला स्मार्ट विलेज बन चुका है। हम स्मार्ट शहर की बात तो टी.वी. पर रोज देखते हैं लेकिन डॉ. सामंता ने अपने पुरूषार्थ से कटक शहर की मनपुर पंचायत के अंतर्गत एक छोटे से गांव कलारबंक को स्मार्ट विलेज में परिवर्तित कर दिया है। इस गांव के विकास की कल्पना डॉ. सामंता के मन में वर्ष 2000 में पैदा हुई। इक्कीसवी शताब्दी के पहले छह वर्षों में अर्थात 2006 में ही उड़ीसा के राज्यपाल द्वारा कलारबंक को आदर्श ग्राम  घोषित किया गया था। इसके बाद इस गांव को विगत दस वर्षों में स्मार्ट विलेज के रूप में विकसित कर दिया गया है। आज इस गांव में स्कूल, कॉलेज , अस्पताल, टेली-मेडिसिन की सुविधा सहित ग्रामीण स्वास्थ केन्द्र, पुस्तकालय वाचनालय, पक्की सड़कें, बैंक- ए.टी.एम., डाक घर, पीने का साफ पानी, शौचालय, सामुदायिक केन्द्र, महिला स्वयं सहायता समिति, तथा पांच भव्य मंदिर हैं। इस स्मार्ट विलेज की देखरेख और इसकी सारी व्यवस्थाएं नीलिमारानी मेमोरियल चेरिटेबल ट्रस्ट द्वारा चलाई जाती है।

डॉ. सामंता बताते हैं कि आज कलारबंक गांव को स्मार्ट विलेज बनाने के पीछे उनकी पूज्य माताजी की प्रेरणा है। आज कलारबंक गांव विश्व के मानचित्र पर है। यह डॉ. सामंता का अपनी मां, मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति आदरांजलि है, जिससे वे अपने को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।

डॉ. सामंता ने वनवासी – जनजाति क्षेत्र के लोगों में

ज्ञान का जो दीप प्रकट किया है, उसके प्रकाश और आत्मविश्वास की चमक आज वहां के वनवासी छात्र- छात्राओं के चेहरे पर स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

 

 

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