संघ प्रवाही है अत: प्रासंगिक है

सामान्य तौर पर लोग इस वटवृक्ष को संघ परिवार भी कहते हैं, परंतु संघ का स्वयं का मानना है कि ऐसा कोई संगठनों का समूह उसने तैयार नहीं किया जिसे संघ परिवार कहा जाए। संघ समाज में एक संगठन नहीं है बल्कि समाज का संगठन करने वाला एक सतत प्रवाह है। इसीलिए समय के साथ-साथ इसकी प्रासंगिकता भी बढ़ती रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। साल 2025 में इसे 100 वर्ष हो जाएंगे। संघ की स्थापना के मूल में एक ही भाव था कि बतौर राष्ट्र भारत पुन: ऐसी स्थिति में आए जहां वह विश्व का मार्गदर्शन कर सके। लेकिन इसके लिए पहले भारतीय समाज का रूपांतरण होना आवश्यक था। समाज के रूपांतरण के लिए संघ ने दैनिक शाखा के माध्यम से व्यक्ति निर्माण का कार्य आरंभ किया। संघ रूपी बीज में  एक स्वस्थ, सुदृढ़ भारतीय समाज रूपी वृक्ष का उद्गम निहित था। संघ की 96 वर्ष की यात्रा में इस वृक्ष का प्रकटीकरण आरंभ हो गया है पर अभी इसकी अपनी परिणति पर पहुंचना बाकी है।

संघ की प्रासंगिकता समसामयिक संदर्भों में क्या है? इसके लिए संघ रूपी वटवृक्ष को समझना आवश्यक है। शिक्षा से लेकर चिकित्सा तक तथा धर्मजागरण से लेकर स्वदेशी तक समाज जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां इस वटवृक्ष की शाखाएं पुष्पित पल्लवित न हुई हों। सामान्य तौर पर लोग इस वटवृक्ष को संघ परिवार भी कहते हैं, परंतु संघ का स्वयं का मानना है कि ऐसा कोई संगठनों का समूह उसने तैयार नहीं किया जिसे संघ परिवार कहा जाए। समय-समय पर जिस क्षेत्र में भी राष्ट्रहित में प्रयास करने की आवश्यकता का अनुभव हुआ, वहां संघ के स्वयंसेवकों ने अपने प्रयास किए और अंतत: कार्य को सतत प्रवाह व गतिशीलता प्रदान करने के लिए एक संगठनात्मक ढांचा तैयार किया गया।

संघ की प्रासंगिकता को समझना हो तो संघ के वैचारिक अधिष्ठान को समझना होगा। इसके लिए सुधी पाठक कुछ समय पूर्व प्रकाशित  हुई पुस्तक ’यशस्वी भारत’ का अध्ययन करें तो उन्हें स्पष्टता  मिलेगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझना वैसे आसान नहीं है। फिर भी लोगों को संघ समझना इस पुस्तक के पठन से आसान होगा। साथ ही उन्हें यह भी स्पष्ट होगा कि विभिन्न विषयों पर संघ का वैचारिक अधिष्ठान क्या है और राष्ट्र निर्माण के कार्य में संघ की प्रासंगिता क्या है।

इस संग्रह में 2018 के सितंबर मास में दिल्ली के विज्ञान भवन में पू. सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा दिए गए दो भाषणों तथा तृतीय दिन की प्रश्नोत्तरी का भी अंतर्भाव है। यह कार्यक्रम इस दृष्टि से महत्वपूर्ण था कि पहली बार लगातार तीन दिन तक किसी सरसंघचालक ने समाज के सभी क्षत्रों के प्रतिष्ठित व स्थापित प्रबुद्धजनों से सीधा संवाद किया था। पहले दो दिन पू. सरसंघचालक ने अपने विचार रखे थे तथा तीसरे दिन उन्होंने श्रोताओं की ओर से आए प्रश्नों के उत्तर दिए थे।

इस पुस्तक में 17 भाषणों का संकलन है। इसका प्रकाशन नई दिल्लीत स्थित प्रभात प्रकाशन ने किया है। यह पुस्तक इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि द्वितीय सरसंघचालक मा.स.गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी के भाषणों का संग्रह 1960 के दशक में प्रकाशित हुआ था। इसके उपरांत किसी भी सरसंघचालक के भाषणों का यह पहला संग्रह है।

‘यशस्वी भारत’ पुस्तक में पू. सरसंघचालक ने जो मूल रूप में कहा है, उसमें से कुछ प्रमुख बिंदु यहां संक्षिप्त में दिए जा रहे हैं जिससे संघ के वैचारिक अधिष्ठान, कार्य पद्धति व प्रासंगिकता को समझने में मदद मिलेगी-

* ‘यशस्वी भारत’ पुस्तक के प्रथम अध्याय का शीर्षक है, ‘हिंदू, विविधता में एकता के उपासक’। हम स्वस्थ समाज की बात करते हैं, तो उसका आशय ‘संगठित समाज’ होता है (पृष्ठ 27)।

* हमको दुर्बल नहीं रहना है, हमको एक होकर सबकी चिंता करनी है।

* भारत की परंपरागत संस्कृति के आधार पर पूर्व में कभी इस भारत का जो चित्र दुनिया में था, वह अत्यंत परम वैभव-संपन्न, शक्ति-संपन्न राष्ट्र के रूप में था और परम वैभव, शक्ति-संपन्न होने के बाद भी दुनिया के किसी देश को न रौंदनेवाला था। उलटा सारी दुनिया को एक सुख-शांतिपूर्वक जीने की सीख अपने जीवन से देनेवाला भारत है (पृष्ठ 45)।

* हमारा काम सबको जोड़ने का है।

* संघ में आकर ही संघ को समझा जा सकता है।

* संगठन ही शक्ति है। विविधतापूर्ण समाज को संगठित करने का काम संघ करता है।

* राष्ट्रीयता ही संवाद का आधार हो। वैचारिक मतभेद होने के बाद भी एक देश के हम सब लोग हैं और हम सबको मिलकर इस देश को बड़ा बनाना है। इसलिए हम संवाद करेंगे (पृष्ठ 73)।

* संघ का काम व्यक्ति-निर्माण का है। व्यक्ति निर्मित होने के बाद वे समाज में वातावरण बनाते हैं। समाज में आचरण में परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं। यह स्वावलंबी पद्धति से, सामूहिकता से चलनेवाला काम है। संघ केवल एक ही काम करेगा-व्यक्ति-निर्माण, लेकिन स्वयंसेवक समाज के हित में जो-जो करना पड़ेगा, वह करेगा।

* भारत से निकले सभी संप्रदायों का जो सामूहिक मूल्यबोध है, उसका नाम ‘हिंदुत्व’ है।

* हमारा कोई शत्रु नहीं है, न दुनिया में है, न देश में। हमारी शत्रुता करनेवाले लोग होंगे, उनसे अपने को बचाते हुए भी हमारी आकांक्षा उनको समाप्त करने की नहीं, उनको साथ लेने की है, जोड़ने की है। यह वास्तव में हिंदुत्व है (पृष्ठ 221)।

* परंपरा से, राष्ट्रीयता से, मातृभूमि से, पूर्वजों से हम सब लोग हिंदू हैं। यह हमारा कहना है और यह हम कहते रहेंगे (पृष्ठ 257)।

* हमारा कहना है कि हमारी जितनी शक्ति है, हम करेंगे, आपकी जितनी शक्ति है, आप करो, लेकिन इस देश को हमको खड़ा करना है। क्योंकि संपूर्ण दुनिया को आज तीसरा रास्ता चाहिए। दुनिया जानती है और हम भी जानें कि तीसरा रास्ता देने की अंतर्निहित शक्ति केवल और केवल भारत की है (पृष्ठ 276)।

* देशहित की मूलभूत अनिवार्य आवश्यकता है कि भारत के ‘स्व’ की पहचान के सुस्पष्ट अधिष्ठान पर खड़ा हुआ सामर्थ्य-संपन्न व गुणवत्तावाला संगठित समाज इस देश में बने। यह हमारी पहचान हिंदू पहचान है, जो हमें सबका आदर, सबका स्वीकार, सबका मेल-मिलाप व सबका भला करना सिखाती है। इसलिए संघ हिंदू समाज को संगठित व अजेय सामर्थ्य-संपन्न बनाना चाहता है और इस कार्य को संपूर्ण संपन्न करके रहेगा (पृष्ठ 279)।

इस पुस्तरक की प्रस्तावना लिखते हुए एम.जी.वैद्य ने कहा है-  ‘वर्तमान पीढ़ी इस ‘यशस्वी भारत’ को पढ़े। उसमें व्यक्त किए गए विचारों पर विचार करे। संघ समझने का अर्थ संघ की अनुभूति है। इसलिए हम यथासंभव शाखा के कार्य से जुड़ें और सामाजिक एकता तथा सामाजिक समरसता का अनुभव लेकर अपना जीवन समृद्ध एवं सार्थक बनाएं।’

संघ के स्वयंसेवकों के साथ ही संघ को जानने की इच्छा रखने वालों  को तो यह पुस्तक उपयोगी लगेगी ही पर सबसे अधिक आवश्यकता यह है कि संघ के आलोचक इसे पढ़ें। उनकी कई गलतफहमियां इससे दूर होंगी बशर्ते वे बौद्धिक ईमानदारी के साथ इसे पढ़ें और फिर संघ के बारे में अपनी राय बनाएं।

यहां एक बात और स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि अक्सर संघ को लोग भारतीय जनता पार्टी के चश्मे से देखने का प्रयास करते हैं जिससे कुछ मिथ्या अवधारणाएं भी बन जाती हैं।

जो संघ का विस्तार जानते हैं, उन्हें पता है कि भाजपा उन तीन दर्जन से ज्यादा समविचारी संगठनों में से एक है जो संघ की प्रेरणा से चल रहे हैं। इन सभी संगठनों के कार्यकर्ताओं को वैचारिक दिशा देने का काम संघ का है। इन सभी संगठनों में स्वयंसेवक स्वायत्तता के साथ काम करते हैं। उन्हें जब किसी परामर्श, मार्गदर्शन यां मदद की आवश्यकता होती है तो वे संघ से संपर्क करते हैं। संघ अपनी ओर से यथाशक्ति उनके लिए प्रयास करता है और इस प्रक्रिया में अक्सर अपने कुछ कार्यकर्ताओं को भी इन संगठनों को काम करने के लिए देता है। भाजपा के साथ कोई विशेष व्यवहार नहीं किया जाता है।

भाजपा और संघ के संबंध दो धरातल पर हैं-पहला औपचारिक और दूसरा अनौपचारिक। संघ के कुछ कार्यकर्ता एक औपचारिक व्यवस्था के अंतर्गत भाजपा में संगठन मंत्री व सह संगठन मंत्री के रूप में अपना योगदान भाजपा के संगठन को मजबूत करने के लिए देते हैं। अनौपचारिक स्तर पर संबंधों की बात करें तो संघ के कई स्वयंसेवक भाजपा व भाजपा नीत सरकारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। भाजपा के अब तक के दोनों प्रधानमंत्री-अटल बिहारी वाजपेयी व नरेंद्र मोदी संघ के प्रचारक रहे हैं। केंद्र व राज्य सरकारों में कई मंत्री, मुख्यमंत्री आदि संघ के स्वयंसेवक हैं। ऐसे में उन्हें संघ की ओर से कोई एजेंडा नहीं दिया जाता है। वे स्वयंसेवक के रूप में संघ में मिले संस्कारों के अनुरूप समाज के रूपांतरण व देश के विकास के लिए जो होना चाहिए वे करने का प्रयास करते हैं। वे ठीक कर रहे हैं या गलत, ये अलग बहस का मुद्दा है। इस पर वैचारिक मतभेद हो सकते हैं पर मुद्दे की बात यह है कि भाजपा के राजनीतिक प्रबंधन में संघ की कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका नहीं है।

अगर आप संघ को भाजपा के नजरिए से देखना बंद कर संघ को उसी के परिप्रेक्ष्य से देखेंगे तो यह स्पष्ट होगा कि सत्ता व राजनीति संघ की प्राथमिकताओं में कभी नहीं रही। भाजपा व उसकी सरकारें जो फैसले करना चाहें वे अपने हिसाब से करती हैं, ऐसा नहीं है कि संघ एक स्कूल प्रिंसिपल है जो भाजपा नेताओं रूपी छात्रों को ठोक-पीट कर अनुशासन में रखता है। संघ समाज में एक संगठन नहीं है बल्कि समाज का संगठन करने वाला एक सतत प्रवाह है। इसीलिए समय के साथ-साथ इसकी प्रासंगिकता भी बढ़ती रही है।

 

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