संस्कृत  साहित्य  परम्परा

कुमाऊं और गढ़वाल में कई ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जिनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उत्तराखंड में संस्कृत साहित्य की परंपरा मौजूद थी। इन साक्ष्यों तथा ऐतिहासिक धरोहरों में से अधिकतर बहुत ही जीर्ण-क्षीर्ण स्थिति में हैं। इन धरोहरों का रखरखाव तथा संस्कृत का प्रचार-प्रसार इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उत्तराखंड की द्वितीय राज्यभाषा भी संस्कृत है।

भारत की समृद्धि का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इतिहासकार भारत को सोने की चिड़िया कहते रहे हैं। नालंदा और तक्षशिला जैसे महाविद्यालय भारत को विश्वगुरु बनाते थे। सम्पूर्ण भारतवर्ष में संस्कृत आम जनमानस की भाषा हुआ करती थी। इसके साक्ष्य समय-समय पर पुरातत्व विभाग एवं इतिहासकारों को प्राप्त होते रहे हैं।

भारतवर्ष के साथ-साथ उत्तराखंड में भी संस्कृत भाषा का ही प्रचलन था। यहां भी संस्कृत भाषा बोली, पढ़ी व समझी जाती थी। उत्तराखंड कि स्थानीय भाषाएं, (कुमाऊंनी, गढ़वाली) संस्कृत से प्रभावित नजर आती हैं। दोनों ही भाषाओं में अधिकांश शब्द संस्कृत से लिए गए स्पष्ट नजर आते हैं।

उत्तराखंड पूर्व में उत्तर प्रदेश का एक हिस्सा था। जो अनेकों संघर्ष के बाद 9 नवंबर सन 2000 को अलग हुआ, उसके बाद और पूर्व में भी यहां अनेक शोध हुए जिनमें यह स्पष्ट होता है कि उत्तराखंड भी साहित्य का गढ़ रहा है, जिनमें संस्कृत साहित्य भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उत्तराखंड में दो मंडल हैं। गढ़वाल और कुमाऊं। दोनों ही मंडलों का वर्णन वेदों से लेकर ब्राह्मण ग्रंथ आरण्यक उपनिषद् और पुराणों सभी में मिलता है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी उत्तराखंड को विशेष स्थान दिया गया है। स्कन्दपुराण में हिमालय को पांच भौगोलिक क्षेत्रों में विभक्त किया गया है –

खण्डाः पञ्च हिमालयस्य कथिताः नैपालकूमांचंलौ।

केदारोऽथ जालन्धरोऽथ रूचिर काश्मीर संज्ञोऽन्तिमः॥

उपरोक्त पौराणिक श्लोक में नेपाल, कुमाऊ ं, गढ़वाल, हिमालय और कश्मीर पांच हिमालयी खंड बताए गए हैं।

स्कन्द पुराण में केदारखंड में गढ़वाल और मानस खंड में कुमाऊं का विस्तृत वर्णन है। हरिद्वार से हिमालय तक के विस्तृत क्षेत्र को केदारखंड और नंदा देवी पर्वत से कालागिरी तक के क्षेत्र को मानस खंड कहा गया है। एक तरह से नंदा देवी पर्वत इन दोनों खण्डों की विभाजन रेखा पर स्थित है। ऋग्वेद में सर्वप्रथम उत्तराखंड का वर्णन देखने को मिलता है। महाभारत के अंतर्गत भी पांडवों के उत्तराखंड आने का वर्णन है, एवं भगवान श्री राम द्वारा देवप्रयाग में की गई तपस्या का कई ग्रंथों में वर्णन मिलता है।

यह तो रही संस्कृत साहित्य में उत्तराखंड के स्थान की बात अब देखते हैं उत्तराखंड में संस्कृत साहित्य की क्या स्थिति थी। यूं तो कुमाऊं और गढ़वाल में कई ऐसे साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जिनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उत्तराखंड में संस्कृत साहित्य की परंपरा मौजूद रही होगी।

गढ़वाल से प्राप्त संस्कृत साहित्य परम्परा के साक्ष्य

अनुसूया मंदिर से प्राप्त साक्ष्य 

अनुसूया मन्दिर में राजा सर्ववमन से संबंधित वर्णन मिलते हैं। जो स्वयं संस्कृत भाषा में उल्लेखित थे। ऐसा भी कहा जाता है कि राजा सर्ववमन स्वयं भी संस्कृतज्ञ एवं विद्वान थे। यह अभिलेख पाषाण पर लिखे गए हैं।

देवप्रयाग से प्राप्त यात्री सूची

देवप्रयाग में दूसरी शताब्दी से पांचवीं शताब्दी के बीच आए हुए यात्रियों की नामावली मिलती है। यह नामावली भी संस्कृत में ही लिखी गई है। इसका अभिप्राय यह है कि दूसरी शताब्दी से पांचवीं शताब्दी तक उत्तराखंड में संस्कृत प्रमुख भाषा रही होगी।

उत्तरकाशी का शक्ति स्तंभ

उत्तरकाशी के शक्ति स्तंभ से प्राप्त लेख 12 वीं शताब्दी का जान पड़ता है। माना जाता है कि यह तत्कालीन राजा के द्वारा लिखवाया गया होगा या फिर राजा की प्रशंसा में किसी ने लिखा होगा। इस लेख में राजा गणेश्वर के वानप्रस्थ आश्रम एवं उनके पुत्र श्रीगृह के सुशासन का वर्णन एवं राजा की प्रशंसा प्राप्त होती है।

पलेठी का शिलालेख

पलेठी जो देवप्रयाग से लगभग 12 से 13 किलोमीटर की दूरी पर टिहरी क्षेत्र में आता है। जहां लगभग सातवीं शताब्दी का सूर्य मंदिर विद्यमान है, यहां पर प्राप्त शिलालेख गुप्त लिपि अथवा  ब्राह्मी लिपि में मौजूद हैं, जो संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं। मंदिर के शिलापट पर राजा कल्याणवर्मन एवं राजा आदिवर्मन का भी परिचय प्राप्त होता है।

बाड़वाला जगतग्राम में स्थित अश्वमेध यज्ञ स्थल

बाड़वाला जगतग्राम में कुछ अश्वमेध यज्ञ स्थल प्राप्त हुए हैं। जो सन् 1952 से 1954 के बीच पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की नजर में आया यहां पर मौजूद शिलालेख ब्रह्मी लिपि एवं संस्कृत भाषा में लिखा गया है। इन अभिलेखों में तीसरी शताब्दी ईस्वी में राजा शीलवर्मन द्वारा चार अश्वमेघ यज्ञ करने का वर्णन मिलता है।

लाखामंडल का शिलालेख

लाखामंडल वह स्थान है जहां पर पांडवों को और उनकी माता कुंती को जिंदा जलाने के उद्देश्य से लाक्षागृह का निर्माण किया गया था। जहां पर भी कई ऐसे तथ्य मिले हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि उत्तराखंड में संस्कृत बोली जाती थी। यहां पर शिवजी का एक मंदिर विद्यमान है जो देहरादून से 128 किलोमीटर की दूरी पर है। गुप्तोत्तर काल में सातवीं शताब्दी में सिंहपुर के यदुवंशीय शासक भास्कर वर्मन की पुत्री ईश्वरा ने अपने पति श्री चन्द्र गुप्त (जालंधर का शासक) की पुण्य स्मृति में लाखा मंडल में शिव मंदिर का निर्माण कराया था।

कुमाऊं की संस्कृति में बसी संस्कृत साहित्य की महान परम्परा

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में अनेक कवि एवं साहित्यकार हुए जिन्होंने संस्कृत साहित्य में अपना अमूल्य योगदान दिया संस्कृत साहित्य के उत्थान में इन साहित्यकारों का विशेष योगदान है। जिनमें आचार्य विश्वेश्वर पांडे एवं आचार्य केदार पांडे महत्वपूर्ण हैं। चंद्रवंशी राजाओं के समय में कुमाऊं में संस्कृत मूल भाषा हुआ करती थी, परन्तु बद्रीदत्त पाण्डेय की कुमाऊं का इतिहास पढने पर यह भी स्पष्ट होता है कि उस समय भी कुमाउनी भाषा ही आम बोलचाल की भाषा थी, उस समय के अनेक कवि थे, जो संस्कृत भाषा में ही काव्यों की रचना करते थे। देखा जाए तो कुमाऊं गढ़वाल से अधिक संस्कृत साहित्य प्रधान राज्य रहा है।

यूं तो समय से प्राकाशित न हो पाने के कारण कई महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज और साहित्यकार इतिहास की धूल में कहीं खो गये हैं तथापि कुछ विद्वानों का नाम अभी भी साहित्य जगत में बड़े आदर के साथ लिया जाता है। इन्ही में से कुछ विद्वानों की चर्चा करते हैं।

आचार्य हरिहर

श्री हरि संस्कृताचार्य वासुदेव तथा आचार्य विज्ञानेश्वर के समकालीन चंद्रवंशीय राजाओं के मूल पुरूष सोमदेव (700-721 ई.) के साथ उत्तराखंड में आए थे तथा ये पाण्डेयास्पद ब्राह्मण थे। श्रीहरि (हरिहर) पारस्करगृह्यसूत्र के टीकाकार थे। आचार्य हरिहर की ही वंश परम्परा में 17वीं शताब्दी में अलंकारकौस्तुभ, अलंकारमुक्तावली, अलंकारप्रदीप, रसचन्द्रिका जैसे काव्य शास्त्र लिखने वाले आचार्य विश्वेश्वर पांडेय हुए।

केदार पांडेय

आचार्य हरिहर के बाद दूसरा नाम आचार्य केदार पांडेय का आता है। जिन्होंने छंद शास्त्र के महत्वपूर्ण ग्रंथ वृत्तरत्नाकर की रचना की। कुमाऊं का इतिहास पुस्तक को देखें तो उस समय संस्कृत में ग्रन्थों की रचना हो रही थी परंतु मूल भाषा कुमाउनी ही थी। और राज काज में कुमाउनी भाषा को ही ज्यादा महत्व दिया जाता था।

राजा रुद्रचन्द्र देव एवं उनके ग्रन्थ

राजा रुद्र चंद्रदेव संस्कृत साहित्य के महान विद्वान हैं जिन्होंने  उषारागोदया नाटिका, श्यैनिकशास्त्रम तथा त्रैवर्णिक धर्मनिर्णय तथा ययातिचरितम् जैसे ग्रंथो की रचना की। इनका ययातिचरितम् नाटक है। राजा रुद्रचन्द मुगल आक्रान्ता बाबर के पौत्र अकबर के समकालीन थे। इनका समय 16 वीं सदी का उत्तरार्ध माना जाता है।

ज्योतिषाचार्य रुद्रमणि

रूद्रमणि अपने समय के प्रसिद्ध ज्योतिषी थे। ये चन्द राजा बाजबहादुर के सभा पण्डित थे अतः इनका समय सन् 1638 1678 ई. मान्य है। ये अल्मोड़ा से कुछ दूरी पर स्थित ’माला’ गांव के निवासी थे। इनके पिता का नाम महादेव था। पण्डित रुद्रमणि की दो रचनाएं हैं रुद्रप्रदीप एवं ज्योतिषचन्द्रार्क। रुद्रप्रदीप इनकी पहली रचना है। इसमें आचार्य ने सूक्ष्म रूप से फलित विषयों का निर्देश किया है।

इसके अतिरिक्त अनेक साक्ष्य कुमांऊ से प्राप्त हुए हैं। यहां भी सबसे अधिक अल्मोड़ा जिले से प्राप्त हुए हैं, जिनमें से विक्रम की तीसरी सदी के सिक्के सबसे महत्वपूर्ण हैं। तीसरी शताब्दी के बाद जितने भी साक्ष्य या लेख शिलालेख कुमाऊं में प्राप्त हुए हैं अधिकतर संस्कृत भाषा में ही छंदोबद्ध हैं। जागेश्वर एवं तालेश्वर से प्राप्त शिलालेख भी संस्कृत भाषा में प्राप्त हुए हैं। वैजनाथ मंदिर का शिलालेख जो 11 वीं सदी का है वह भी संस्कृत भाषा में प्राप्त है।

उपरोक्त विवरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि उत्तराखंड में संस्कृत साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान रहा है एवं वर्तमान में उपरोक्त ऐतिहासिक धरोहरों में से अधिकतर बहुत ही जीर्ण-क्षीर्ण स्थिति में हैं। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। ऐतिहासिक धरोहरों को जिस प्रेम से संजोकर रखना चाहिए हम नहीं रख पाए परन्तु अब सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिये। एवं संस्कृत के प्रचार-प्रसार पर भी ध्यान देना चाहिए, संस्कृत का प्रचार-प्रसार इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उत्तराखंड की द्वितीय राज्यभाषा भी संस्कृत है।

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