काशी बना भारतीय संस्कृति के गौरव का प्रतीक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण के साथ इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय का निर्माण हुआ। प्रमुख संप्रदायों के संतों की मौजूदगी में महादेव का अनुष्ठान हुआ। गंगा घाटों के साथ शहर की प्रमुख भागों को सजाया गया था। काशी विश्वनाथ मंदिर के सात संपूर्ण कॉरिडोर के लोकार्पण को उत्सव का रूप देने के लिए गंगा घाट पर 10 लाख दीप जलाकर विशेष दीपोत्सव मनाया गया। इस दिन गंगा आरती भी विशिष्ट था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह लोकार्पण के बाद मंदिर से जुड़े मजदूरों पर पुष्प वर्षा कर उनका न केवल सम्मान किया, उनके साथ भोजन किया तथा साथ बैठकर तस्वीरें खिंचाई निश्चित रूप से वह श्रम के साथ समाज के आम व्यक्ति का सम्मान था। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का समागम हुआ। प्रधानमंत्री ने खुद क्रूज पर ही देर रात तक इनके साथ बैठक की। 

मोदी ने ठीक ही कहा कि विश्वनाथ धाम का ये पूरा नया परिसर एक भव्य भवन भर नहीं है, ये प्रतीक है, हमारे भारत की सनातन संस्कृति का, हमारी आध्यात्मिक आत्मा का, भारत की प्राचीनता का, परम्पराओं का, भारत की ऊर्जा का, गतिशीलता का। आगे उन्होंने जो कुछ कहा वह उस स्थान से देशवासियों को प्रेरित करने के लिए था। उदाहरण के लिए उन्होंने कहा कि मेरे लिए काशी ईश्‍वर का रूप है। देश का हर नागरिक ईश्‍वर का ही अंश है। मेरे लिए आप ईश्‍वर हैं। ईश्‍वर मानकर आपसे कुछ मांगता हूं। देश के लिए ये तीन संकल्‍प मांगता हूं। स्‍वच्‍छता, सृजन और देश को आत्‍मनिर्भर बनाने के लिए अनवरत प्रयास। देश का हर नागरिक जब कुछ नया करेगा, इनोवेटिव करने की कोशिश करेगा तब देश आगे बढ़ेगा। उन्हे देश को आत्‍मनिर्भर बनाना सभी का प्रयास होना चाहिए।  इस तरह प्रधानमंत्री ने मंदिर परिसर सहित पूरे कॉरिडोर के निर्माण कार्य को राष्ट्र के उन्नयन के साथ जोड़ा ताकि लोग इससे प्रेरित होकर काम करें।

वास्तव में उनके कहने का अर्थ यह था कि जो कुछ काशी विश्वनाथ मंदिर का नया रूप दिखाई पड़ रहा है अगर कुछ करने की भावना नहीं होती,कल्पना नहीं किया जाता तथा सृजन का संकल्प नहीं होता तो यह महान सपना साकार नहीं होता। यानी आप बड़ी कल्पना करें, उसके लिए अनुसंधान करें ,सृजन करें फिर एक दिन विश्व का सर्वाधिक प्रभावशाली देश बन जाएगा। मोदी के इस बात पर सबसे ज्यादा तालियां बजी कि जब कोई औरंगजेब आता है तो शिवाजी महाराज जैसे लोग खड़े हो जाते हैं। मोदी ने घोषणा की कि इतिहास का काला अध्याय एक पन्ने तक सिमट कर रह गया है। यानी इतिहास के क्रूर शासकों ने जो क्रूरता है कि उनका प्रतिकार पुनर्निर्माण के साथ पूरा हो गया है।  इसका हम अपने अनुसार अर्थ लगा सकते हैं लेकिन निश्चित रूप से यह भारतवासियों के अंदर संतोष और गर्व का भाव पैदा करेगा कि इतिहास में जो भी अन्याय हुआ, हमारे धर्म स्थलों का मान- मर्दन हुआ इस नवनिर्माण के साथ उनका सकारात्मक सृजनात्मक प्रतिकार पूरा हो चुका है।

इसके पुनर्निर्माण की शुरुआत मार्च 2018 में हुई थी। पूरी योजना 800 करोड़ की लागत से 33 महीने में साकार हुई। काशी विश्वनाथ परिसर 399 करोड़ में पूरा हुआ।  मंदिर के अब तक के इतिहास में उसके जीर्णोद्धार के कई अध्याय इतिहास में उल्लिखित हैं, परंतु इसके साथ संपूर्ण विश्वनाथ धाम का निर्माण पहली बार हुआ है। गंगा तट से मंदिर के गर्भगृह तक बने काशी विश्वनाथ धाम का यह नया स्वरूप 241 साल बाद दुनिया के सामने आया है। इतिहासकारों के अनुसार किशी विश्वनाथ मंदिर पर वर्ष 1194 से लेकर 1669 तक कई बार हमले हुए। उसका विध्वंस अनेक बार किया गया। स्वाभाविक ही मंदिर के साथ इसके आसपास के निर्मित स्थलों और भवनों का भी विध्वंस हुआ । जो परिस्थितियां उनका कालो में थी उनमें संपूर्ण योजना बनाकर पुनर्निर्माण संभव नहीं रहा होगा। 1777 से 1780 के बीच मराठा साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। इस तरह इसका पुनर्निर्माण ढाई सौ वर्षों बाद हुआ है। मोदी ने इस संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित होने के साथ ही इसके उद्धार पर विचार विमर्श शुरू कर दिया था। अगर आपको याद हो तो उन्होंने आठ मार्च 2019 को मंदिर के भव्य दरबार का शिलान्यास किया था।

तब भी ज्यादातर लोगों को इसका आभास नहीं था कि आने वाले समय में हम काशी विश्वनाथ मंदिर सहित पूरे क्षेत्र को ऐसे स्वरूप में देखेंगे जिसकी आसानी से कोई कल्पना भी नहीं कर सकता । पहले यहां मंदिर क्षेत्र केवल तीन हज़ार वर्ग फीट में था। पहले के स्थिति पर ज्यादातर तीर्थयात्री  किसी न किसी रूप में अपना असंतोष प्रकट करते थे । लेकिन सरकार और प्रशासन की सोच रही थी कि जैसा है वैसा ही रहेगा। वैसे भी धर्म स्थलों और उसके क्षेत्र के पुनर्निर्माण की कल्पना हमारी सरकारों राजनीति और प्रशासन के अंदर रहा ही नहीं है। प्रधानमंत्री द्वारा संपूर्ण क्षेत्र के पुनर्निर्माण की घोषणा के बाद भी ज्यादातर लोग इस पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थे। उस समय विरोधी नेताओं एक्टिविस्टों के बयानों तथा मीडिया में आए लेखों को देखें तो इसका आभास हो जाएगा कि इसे कोरी कल्पना से लेकर ना जाने क्या-क्या कहा गया। आज यह परिसर  बढ़कर 5 लाख 27 हजार 730 वर्ग फीट हो गया है। किसी क्षेत्र को 170 गुना बढ़ा देना वह भी भारत जैसे देश में कितना दुष्कर कार्य होगा इसकी जरा कल्पना करिए तो थोड़ी बहुत इसके सामने आने वाली परेशानियों कठिनाइयों का आभास आपको अवश्य हो जाएगा। अब पहले गंगा का दर्शन-स्नान और वहां से सीधे विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश।

आलोचक कुछ भी कहें, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक काशी विश्वनाथ मंदिर का प्राचीन गरिमा और गौरव आधुनिक तरीके से हुए इस व्यापक नवनिर्माण के कारण केवल पुनर्स्थापित नहीं हुआ बल्कि ज्यादा प्रभावशाली हुआ है। यह आसान नहीं था। मंदिर के आसपास के शिवालयों और मंदिरों का जीर्णोद्धार करना था तो विश्वनाथ मंदिर को गंगा से जोड़ने के साथ पूरे शहर को इसकी आध्यात्मिक -सांस्कृतिक -ऐतिहासिक और आर्थिक विशेषताओं के अनुरूप नया कलेवर भी देना था। उन मंदिरों को भी पुनर्निर्मित कर इस कल्पना के अनुरूप बनाना पड़ा जो  अलग-अलग निजी घरों से निकले। इसमें 40 से अधिक मंदिरों को जीर्णोद्धार के दौरान संरक्षित किया गया । उन मंदिरों की मूर्तियों को पुनर्स्थापित करने के साथ उनके इतिहास और महत्व को समझाने के लिए सॉफ्टवेयर तैयार किया गया। अनेक मकानों पर बरसों से दूसरे लोगों का कब्जा था। धरना ,विरोध प्रदर्शन आरंभ हो गए थे। बाजार भाव से ज्यादा कीमत देकर मालिकों को मनाया गया। 300 से ज्यादा मकान करीब 400 करोड रुपए में खरीदे गए। दुकानदारों, धर्मशालाओं, मठों और विद्यालयों का पुनर्वास और उन्हें आजीविका का वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराना था। किसी समय सीमा में सारी बाधाओं को दूर कर पुनर्निर्माण करना कितना कठिन रहा होगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। सबको धार्मिक ,आध्यात्मिक ,सांस्कृतिक गरिमा के साथ पूरी योजना के अनुरूप स्थापत्य का स्वरूप भी देना था और वह हुआ है। गंगा व्यू गैलरी, मणिकर्णिका, जलासेन और ललिता घाट से धाम आने के लिए प्रवेश द्वार और शानदार रास्ता बनाया गया है।

यहां आने वाले केवल दर्शन पूजन ही न करें उन्हें इसके पूरे इतिहास, आध्यात्मिक सांस्कृतिक महत्व का भी ज्ञान हो इसके लिए भी विशेष काम हुआ है। धाम की दीवारों पर उपनिषद, वेद-पुराण की संबंधित जानकारियां, चित्रों, श्लोकों सबका हिंदी अनुवाद कराकर दीवारों पर लिखने का काम किया जा रहा है। भारत की सभ्यता- संस्कृति और गौरवपूर्ण इतिहास का भी उल्लेख उपलब्ध तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर किया जा रहा है। इसके लिए विद्वानों और लेखकों की पूरी टीम बनाई गई जो सक्रिय है।भारत के प्राचीन धार्मिक ऐतिहासिक और गौरवशाली शहरों में से एक काशी को हमेशा महत्वपूर्ण स्थान हासिल रहा है । कहा जाता है कि महर्षि वेद व्यास ने चारों वेदों का सर्वप्रथम उपदेश काशी में ही दिया था। यहां 56 विनायक हैं। इसे मोक्ष प्रदान करने वाली सातों नगरी का समुद्र भी माना गया है। इसे द्वादश आदित्यों और पांचों तीर्थ वाली नगरी भी माना गया है।

यह सब वहां तीर्थयात्रियों को दीवारों पर अंकित मिलेंगे। इन सबके साथ मणिकर्णिका तीर्थ की स्थापना, ढुंढिराज गणेश की प्रथम शिव स्तुति, अष्ट भैरव की स्थापना, भगवान शंकर का 64 योगिनियों को काशी में भेजना, बाबा विश्वनाथ के त्रिशूल पर टिकी काशी, भोलेनाथ के अष्ट मातृकाओं की स्थापना, महाकवि कालिदास की शिव स्तुति आदि का वर्णन भी धाम की पट्टिकाओं पर हो रहा है। इन सबका अंकन ऐसी तकनीक और विशेषताओं के साथ हो रहा है ताकि यह वर्षों तक मिटे नहीं। आने वाले श्रद्धालुओं की थोड़ी भी रुचि अगर जानने समझने की होगी तो उन्हें वहां की पट्टिकाओं ,दीवारों पर ही पूरा ज्ञान मिल जाएगा।  इस तरह औ“की कल्पना में प्रधानमंत्री मोदी ने कितने मस्तिष्क को शामिल किया होगा, कैसे-कैसे व्यक्तित्व इसके लिए सामने आए होंगे अगर इन सबको समाहित करके देखें तो फिर कहना पड़ेगा कि वाकई संपूर्ण योजना अद्भुत और अकेला है। काशी और आसपास के क्षेत्र भारत और विश्व के प्रमुख तीर्थ और पर्यटन स्थल में परिणत होंगे इसकी उम्मीद करनी चाहिए।

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