आंखों से नहीं दिमाग से देखिए

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भारतीय फिल्म जगत के इस पूरे ‘बे्रन वॉश’ के पीछे एक मजबूत लॉबी काम कर रही है। इंडस्ट ्री में जो अभिनेता इस लॉबी का काम करने से मना कर देता है, उनको खतम करने में यह लॉबी जुट जाती है। फिर या तो उस व्यिे का करियर खत्म हो जाता है या जीवन। सुशांत सिंह राजपूत इसका ताजा उदाहरण है।

नाम को सार्थक करता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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घ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सेवा कार्यों को करने के दौरान संघ ने केवल सेवा की भावना को ही कायम रखा है। परंतु वह किसी एक प्रकार के ‘पैटर्न’ या ‘फॉर्मेट’ में कार्य नहीं करता और न ही इस सेवा के पीछे उसका कोई छिपा एजेंडा होता है। अत: संघ उस समय की परिस्थिति को देखते हुए आवश्यकता के अनुरूप बिना किसी भेदभाव के समाज को साथ लेकर समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक सहायता पहुंचाने के लिए कटिबद्ध होता है।

न सुनवाई, न अपील, सीधे फैसला

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देश में, विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार में, गुंडाराज फैला हुआ था। गुंडों को राजनैतिक पार्टियों और पुलिस का आश्रय प्राप्त था। लोगों में डर फैलाने और अपना खौफ बनाने के लिए ये गुंडे कमर में तमंचे बांधे ऐसे घूमते थे, जैसे कोई बहुत बड़ा पराक्रम कर रहे हों। उनके इसी आतंक और दबदबे का फायदा राजनैतिक पार्टियां चुनावों तथा अन्य समय पर उठाती रहीं।

नए उत्साह से आगे बढ़ने का समय

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सकारात्मक घटनाओं पर चिंतन करना आवश्यक है। साथ ही स्वयं से भी यह प्रश्न पूछना आवश्यक है कि हमें विगत तीन महीनों में जो नहीं हुआ उसे ही लिए बैठे रहना है या आने वाले समय में जो आशा की किरण दिखाई दे रही है, जो अवसर दिखाई दे रहे हैं, उनकी ओर नए उत्साह से मार्गक्रमण करना है।

बिहार में विकास बनाम परिवारवाद

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   बिहार में कोरोना संक्रमितों की संख्या 8000 को पार कर चुकी है। इस तरह बिहार में खतरनाक चीनी वायरस की चपेट में आ रहे लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। अब इस वर्ष के आखिर तक विधान सभा के चुनाव भी होने वाले हैं। कोरोना और चीनी वायरस बिहार के लोगों के सिर पर जिस तरह सवार है, उसी तरह विधान सभा चुनाव का बुखार भी आहिस्ता आहिस्ता बिहारियों के सिर चढ़कर बोल रहा है। इस चुनावी बुखार के लक्षण अबं नजर आने लगे हैं।

राष्ट्रहित में नकार भी आवश्यक

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अब आम जनता ने घटनाओं का विश्लेषण करना शुरू कर दिया है, अत: यह आवश्यक है कि इस बात का भी विचार किया जाए कि जो घटनाएं घटित हो रही हैं उनमें हमारी क्या भूमिका हो सकती है। यह सही है कि देश का हर व्यक्ति सीमा पर जाकर युद्ध नहीं कर सकता और न ही बॉलीवुड में लॉबिंग कर रहे लोगों का गिरेबान पकड़कर यह नहीं पूछ सकता कि तुम्हें किसी की प्रतिभा को मारने का हक किसने दिया? परंतु आम नागरिक के पास सबसे अच्छा हथियार है, नकार।

शांतिदूतों को अब शांत रहना होगा

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हमारे यहां के तथाकथित कुछ बुद्धिजीवी नेता, राष्ट्रविरोधी मीडिया जिहादी आतंकवाद को समाप्त करने का रोना तो हर समय रोते हैं; परंतु स्वयं इस राष्ट्रविरोधी आतंकवाद के विरोध में कुछ ठोस कदम उठाने का साहस नहीं करते। यही क्यों, सदा पैंतरे बदलने वाले कुछ राजनीतिक नेता भी अपने स्वार्थ के कारण इस्लामीकरण को सहयोग देते नजर आते हैं।

चीनी शतरंज के नेपाली-पाकिस्तानी प्यादे

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एशिया महाद्वीप में चीन को टक्कर दे सकने वाला एक ही देश है भारत। चीन भारत से सीधा युद्ध बहुत कम करता है। वह हमेशा छुपकर वार करने की नीति अपनाता है। इस बार भी वह भारत को नुकसान पहुंचाने और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिमा खराब करने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए उसने अपने शतरंज के दो प्यादों नेपाल और पाकिस्तान को चुना है। इन देशों के माध्यम से वह ऐसे मुद्दे उठाने की कोशिश कर रहा है जिनका कभी अस्तित्व ही नहीं रहा है, चाहे वह भारत-नेपाल की विवादित भूमि का हो या इमरान खान के बयान का।

मजदूर : संवाहक या योद्धा

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अभी संम्पूर्ण देश एक तराजू की तरह है, जिसके एक पलड़े पर पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात जैसे विकसित राज्य हैं। ये राज्य खेती-किसानी या उद्योगों के कारण प्रगति कर रहे हैं। तराजू के दूसरे पलड़े पर वे राज्य हैं जो तुलनात्मक दृष्टि से पिछड़े माने जाते हैं। कालांतर में पिछड़े राज्य के मजदूर अपनी आजीविका और भविष्य संवारने के उद्देश्य से इन विकसित राज्यों में आते रहे तथा इस ओर के पलड़े को अधिक भारी करते गए। परिणाम यह हुआ कि एक पलड़ा जरूरत से ज्यादा झुक गया और दूसरा बिलकुल रीता हो गया। अब इस कोरोना की त्रासदी के कारण जबकि अधिकतर मजदूर अपने रीते पलड़े की ओर वापस लौट गए हैं तो आवश्यकता है कि उन्हें वहीं रोके रखने की जिससे तराजू के दोनों पलड़े फिर से समान हो जाएं।

 हुनर ही तारेगा भारत को

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कोविड-19 के लिए आज सारी दुनिया चीन को दोषी मान रही है। आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए उसने तीसरा विश्वयुद्ध छेड़ दिया है।

हिंदू घटेगा देश बंटेगा

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इन राष्ट्रविरोधी ताकतों का कार्य और उनके षड्यंत्रों को सारे समाज के सामने लाना आवश्यक है। उनके चेहरों पर सेवा का जो मुखौटा लगा हुआ है जिसे उतारना होगा। वरना वे धीरे-धीरे हिंदुओं को ही हिंदुओं के विरुद्ध खड़ा करने में सफल हो जाएंगे।

महिलाओं पर निर्भर है महिलाओं का विकास

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एक ओर जहां नगरीकरण, औद्योगिकरण एवं सांस्कृतिक खुलापन बढ़ रहा है वही नारी अस्तित्व पर आक्रमण भी बढ़ रहे हैं। बलात्कार, भ्रूण हत्या, दहेज, हत्या व अन्य वारदातें समय-समय पर हमारे सामने उपस्थित हो रही हैं।

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