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नेतृत्वहीन महागठबंधन का ढोल जनता बजाएगी

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2014 के बाद देश के राजनीतिक मंच पर मोदी लहर आई थी, जिसमें भाजपा विरोधियों का गठबंधन लगभग बह गया था। विरोधियों ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ पूरी ताकत लगाई थी। संसद भवन से लेकर नुक्कड़ सभाओं तक यह परिलक्षित हो रहा था। लेकिन, 2019 के चुनाव का माहौल जैसे-जैसे…

फैशन : परंपरा और आधुनिकता का फ्यूजन

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आम तौर पर ‘फैशन’ कहने पर ग्लैमर ही हमारी आंखों के समक्ष आता है। केवल कलाकारों, उच्चस्तरीय लोगों तक ही फैशन सीमित होने के दिन अब लद चुके हैं। अपने रूप और अपनी प्रस्तुति के बारे में आम लोग भी जागरूक हो गए हैं। इसलिए फैशन के क्षेत्र का विस्तार खूब होता जा रहा है। अतः फैशन के क्षेत्र में कदम रखने को युवा अब बहुत उत्सुक हैं। इसमें असीमित अवसर दिखाई देते हैं। फैशन रोजमर्रे के जीवन का अनिवार्य अंग बन गई है। बढ़ती आय के साथ व्यक्ति की क्रय शक्ति भी बढ़ गई है। इसलिए फैशन के क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की बड़े पैमाने पर आवश्यकता है। इससे रोजगार के असीमित अवसर उपलब्ध हो रहे हैं।

देश को आत्मविश्वास दिलाने वाला नेता

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  आज केंद्र और देश की 22 राज्यों में भी भाजपा की सरकार हैं। अटल जी कि अंतिम विदाई के समय भाजपा देश में सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। भाजपा की विकास यात्रा पर गौर करें तो अटल जी का दृढ़ निश्चय याद आता है। दिल्ली के फीरोज शाह…

क्या हम सामाजिक दृष्टिसे अत्याधुनिक है?

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हम सब एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में बदलावों की गति बहुत तीव्र रही है। इसका हमारे व्यवहारों के स्वरूप और जीवनशैली पर भी प्रभाव पड़ रहा है। तकनीकी क्रांति के कारण पिछले कुछ दशकों में भारतीय के रूप में हम प्रचंड वेगवान परिवर्तन अनुभव कर रहे हैं। इन बदलावों के केंद्र में मानवी जीवन है। इसलिए यह प्रश्न उभरना स्वाभाविक है कि न जाने कल की दुनिया कैसी होगी?

ईसाई धर्मप्रचारकों की विकृतियां

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मदर टेरेसा द्वारा स्थापित ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ से 280 नवजात शिशुओं के लापता होने की सनसनीखेज खबर कुछ दिनों पूर्व सामने आई थी। रांची में इस संस्था के द्वारा संचालित ‘निर्मल हृदय’ संस्था से हुई बच्चों की बिक्री के तार देशव्यापी मानव तस्करी से जुडे होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

विकास के मुद्दे को जनआंदोलन का रूप

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स्वामी विवेकानंद से किसी ने पूछा था, ”स्वामी जी आपने आज तक क्या किया है?” जवाब में स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन के अंतिम दिनों की व्याख्या करते हुए कहा था, “एक और विवेकनंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकनंद ने अब तक क्या किया है।”

राष्ट्रविरोधियों की बिसात पर दलित प्यादे?

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  भारतीय राजनीति में चुनाव पूर्व की कालावधि हमेशा ही अस्वस्थता निर्माण करनेवाली रही है और इस अस्वस्थता में जाति आधारित संघर्ष का उपयोग करना अपने देश की राजनीति का कटु सत्य है। फिलहाल भारत में दलित समाज के रोष का आधार लेकर जातिगत राजनीति की जा रही है। क्या…

इच्छा मृत्यु: मृत्यु का सम्मान

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जीवन से त्रस्त हो चुके या समृद्ध जीवन जीने के उपरांत मृत्यु की प्रतीक्षा करने वाले लोग हम अपने आस-पास देखते हैं। कई घरों में अस्सी-पचासी वर्ष के बीमार वृद्ध केवल मृत्यु नहीं होती इसलिए जीवित दिखाई देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्ति के जीवित रहने का व्यापक अर्थ बताते हुए इच्छा मृत्यु के संदर्भ में भले ही सशर्त मान्यता दी हो परंतु यह विषय यहीं खत्म नहीं होता।

‘सेवा संस्कार’ समाज मन में अवतीर्ण हो!

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समाज के सब से अंतिम स्तर तक उन्नति का प्रभाव पहुंचाना ही सेवा कार्य का प्रमुख उद्देश्य है। इसी कर्तव्य भावना से ओतप्रोत होकर आज समाज के विभिन्न क्षेत्रों में हजारों व्यक्ति सेवा कार्य कर रहे हैं। समाज की उन्नति की आकांक्षा अपने अंतःकरण में जगा कर, उसके लिए अविश्रांत परिश्रम करने की ध्येय निष्ठा से ‘सेवा’ एक शक्ति के रूप में देश में फैली है। अपना समाज अनेक प्रकार की विकृतियों और कुरीतियों से पीड़ित है। सामाजिक-आर्थिक विषमताओं से ग्रस्त है। लाखों लोग न्यूनतम शिक्षा, सामान्य चिकित्सा से आज भी वंचित हैं। दु:ख, द

‘सेवा संस्कार’ समाज मन में अवतीर्ण हो!

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समाज के सब से अंतिम स्तर तक उन्नति का प्रभाव पहुंचाना ही सेवा कार्य का प्रमुख उद्देश्य है। इसी कर्तव्य भावना से ओतप्रोत होकर आज समाज के विभिन्न क्षेत्रों में हजारों व्यक्ति सेवा कार्य कर रहे हैं। समाज की उन्नति की आकांक्षा अपने अंतःकरण में जगा कर, उसके लिए अविश्रांत परिश्रम करने की ध्येय निष्ठा से ‘सेवा’ एक शक्ति के रूप में देश में फैली है। अपना समाज अनेक प्रकार की विकृतियों और कुरीतियों से पीड़ित है। सामाजिक-आर्थिक विषमताओं से ग्रस्त है। लाखों लोग न्यूनतम शिक्षा, सामान्य चिकित्सा से आज भी वंचित हैं। दु:ख, द

अभियान में जन भागीदारी आवश्यक

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हम समस्याएं खड़ी करने के विशेषज्ञ हैं; लेकिन उन समस्याओं के प्रभाव के प्रति हमारी स्थिति मूकदर्शक जैसी होती है। मुंबई के साथ ही देश के सभी प्रमुख शहरों में वाहनों की भीड़ से सड़कें तंग हो चली हैं। मिनटों का सफर घंटों में तय होना अब रोजमर्रा की बात हो गई है। विकास के नारों के बीच ज्यादातर नदियां दयनीय और रसायन मिश्रित हो चुकी हैं। देश की सभी नदियां मैला ढोने वाली गटर बन गई हैं। अनेक शहरों में कूड़ों के पहाड़ हो गए हैं जो जहरीली गैस से जनता का जीना बेहाल कर रहे हैं।

चिंता और चिंतन की जरूरत

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लोकतंत्र में चुनाव का विशेष महत्व है. इन चुनावों के माध्यम से जनता अपने भविष्य के सपने को पंख देने की कोशिश करती है. हाल में हुए गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों को इसी दृष्टि से महत्व प्राप्त हो गया था. चुनावों के दौरान हिमाचल की अपेक्षा गुजरात के चुनाव विशेष चर्चित रहे. चुनावी माहौल आरोप-प्रत्यारोपों से उफनता रहा. इसमें एक बात तीव्रता से अनुभव की जा रही थी कि गुजरात के चुनाव देश में भविष्य के राजनीतिक समीकरण बदलने वाले सिद्ध होंगे. नरेंद्र मोदी गुजरात के भूमिपुत्र हैं. इसलिए आरंभ में ऐसा लग रहा था कि यह

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