लेनिन की मूर्ति के बहाने…

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प्रश्न यह उठता है कि भारत में लेनिन की मूर्ति की आवश्यकता ही क्या है? भारत के आदर्श राम-कृष्ण, शिवाजी, छत्रसाल, रानी लक्ष्मीबाई इत्यादि इसी धरती पर पैदा हुए कई सपूत हैं। इनके होते हुए किसी ऐसे व्यक्ति की मूर्ति लगाना कहां तक उचित है, जिसका भारत की प्रगति में कोई योगदान नहीं है।

पूर्वोत्तर में क्षेत्रीय दलों के सहयोग से आगे बढ़ती भाजपा

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पूर्वोत्तर में जिस तरह भाजपा शासित या समर्थित सरकारों के गठन के बाद मुख्यमंत्री स्तर पर जीवंत संबंध आरंभ हुआ है, उसका उत्तर पूर्व के साथ देश के अन्य हिस्से पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। वैसे क्षेत्रीय दलों के सहयोग से ही आगे बढ़ना वर्तमान में जरूरी लगता है।

खोया हुआ आदमी

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“दुखी गांव वालों ने खोये हुए आदमी की याद में उसकी एक मूर्ति बना कर गांव के बीचोंबीच स्थापित कर दी। गांव वालों ने प्रण लिया कि वे उस खोये हुए आदमी के दिखाए मार्ग पर चलेंगे। आज भी यदि आप उस गांव में जाएंगे, तो आपको उस खोये हुए आदमी की वहां स्थापित मूर्ति दिख जाएगी।”

सेवाधाम आश्रम को समस्त महाजन का सहयोग

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समस्त महाजन केवल मुंबई के लिए ही नहीं अपितु पूरे देश के लिए भी रत्नसमान सेवा संस्था है। ऐसी संस्थाओं के सेवाकार्य से हमारा समाज विपदा और विषमताओं पर विजय प्राप्त करता रहता है।

खतरनाक है शी जिनफिंग का फिर सम्राट बनना

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चीनी संविधान में हाल में हुए परिवर्तन से सत्ता का गुरूत्व केंद्र वर्तमान राष्ट्रपति शी चिनफिंग के आसपास बना रहेगा। वे अब मर्जी के मुताबिक जब तक चाहें राष्ट्रपति पद पर बने रह सकते हैं। इससे पूरी दुनिया, विशेष रूप से पड़ोसी देश काफी चिंता में पड़ गए हैं। भारत के लिए शी का आजीवन राष्ट्रपति बने रहना निश्चित तौर से सिरदर्द साबित होने वाला है।

बैंकों की जालसाजी और अनुशासन पर्व

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पंजाब नेशनल बैंक में 13 हजार करोड़ रु. के ऐतिहासिक घोटाले का भंड़ाफोड़ होते ही लोगों का सकते में आना स्वाभाविक है। सरकारी बैंक जिस तरह से अरबों के डूबत कर्जे में फंसे हुए हैं उसे देखते हुए धोखाधड़ी का यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। तथ्य यह है कि ये कांग्रेस शासन के जमाने के कंकाल हैं, जो छिपाए नहीं छिप सकते। मोदी सरकार के जिम्मे अब सफाई का काम आ गया है। जिस तत्परता और कड़ाई से कदम उठाए जा रहे हैं उससे तो लगता है कि वित्तीय क्षेत्र में अनुशासन पर्व का आरंभ हो रहा है।

जड़ से उखाड़ो माओवाद!

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त्रिपुरा में राजनीतिक विजय मनाते समय कम्युनिस्ट विचारधारा के मूल विध्वंसक प्रवाह को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये उनके हार के दिन हैं, इसलिए परदे के पीछे चले गए; परंतु पूरे देश को हिंसक लाल रंग में रंग देने की उनकी व्यूहरचना को ठीक से जान लेना चाहिए और समय पर ही रोकना चाहिए। बेहतर है इस राष्ट्रविघातक विचारधारा को ही जड़ से उखाड़ दिया जाए।

इच्छा मृत्यु: मृत्यु का सम्मान

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जीवन से त्रस्त हो चुके या समृद्ध जीवन जीने के उपरांत मृत्यु की प्रतीक्षा करने वाले लोग हम अपने आस-पास देखते हैं। कई घरों में अस्सी-पचासी वर्ष के बीमार वृद्ध केवल मृत्यु नहीं होती इसलिए जीवित दिखाई देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्ति के जीवित रहने का व्यापक अर्थ बताते हुए इच्छा मृत्यु के संदर्भ में भले ही सशर्त मान्यता दी हो परंतु यह विषय यहीं खत्म नहीं होता।

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