प्रकृति और अध्यात्म के सम्मोहन का सिद्ध मंत्र उत्तराखंड

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9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड नाम से भारतीय गणतंत्र का 27 वां राज्य बना। उस समय के प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस राज्य का पुनर्गठन किया। हिमालय की पहाड़ियों से घिरा होने के कारण यहां देश के शेष हिस्सों से लंबे समय तक आवागमन अत्यंत कठिन रहा है किंतु आजादी के बाद इस क्षेत्र में विकास कार्यों का प्रारंभ हुआ और उत्तराखंड राज्य के निर्माण के बाद सड़कों, पुलों, सुरंगों तथा जलाशयों के निर्माण में तेजी आई। इन विकास कार्यों का जनजीवन पर बहुत सकारात्मक असर तो हो रहा है लेकिन गत 7 दशकों में हुए इन परिवर्तनों के बावजूद भी इस प्रांत में बहुत समस्याएं हैं, जिन पर विशेष ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है।

उत्तराखंड भारत की सांस्कृतिक धरोहर – स्वामी विश्वेश्वरानंद महाराज

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सनातन धर्म की पुनर्स्थापना आद्य शंकराचार्य ने की। उन्होंने शस्त्र नहीं चलाया, केवल शास्त्र के माध्यम से ही समाज में सनातन धर्म की पुनर्स्थापना की। इसलिए शास्त्र परम्परा का संरक्षण व संवर्धन होना चाहिए। यह उद्गार व्यक्त करते हुए अपने साक्षात्कार में संन्यास आश्रम के महामंडलेश्वर आचार्य स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि महाराज ने उत्तराखंड के आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश –

सभ्यपणाचे संस्कारपुराय दर्शन (सभ्यता का संस्कारपूर्ण दर्शन)

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गोवा, जिसे दूसरी काशी कहा जाता है, आज रंगरेलियां मनाने के ठीहे के तौर पर दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसलिए भगवान परशुराम की तपस्थली पुण्यभूमि गोमंतक की वास्तविक पहचान पीछे रह गई परंतु अब वहां के लोगों के मन की छटपटाहट बाहर आ रही है कि गोवा की पहचान उसकी सनातन संस्कृति के आधार पर हो, और इस दिशा में सार्थक प्रयत्न भी किया जा रहा है।

हिम हाई सिद्धि संस्कृति (हिम सी सात्विक संस्कृति)

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प्रलय के उपरांत जिस स्थान पर स्वयं भगवान ने मनु को भेजा हो, वहां की संस्कृति की प्राचीनता की क्या उपमा दी जाए? शुद्धता जहां के वातावरण और लोगों की पहचान हो वहां की संस्कृति को क्या कहा जाए? हिमाचल जो गया वहां के प्रेम में न डूबा यह तो हो ही नहीं सकता। सादगी और शुद्धता ही जहां की सुंदरता हो वहां की संस्कृति को क्या कहा जाए?

हब्बा हरिदिनगळल्ली बदुकु नेलेसिदे (उत्सवों में बसी है जान)

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संस्कृति की नींव हमारे उत्सव-त्यौहार हैं और कर्नाटक की तो जान ही उत्सवों में बसती है। कर्नाटक के राजा-महाराजों के समय से चली आ रही उत्सव प्रथाओं को यहां की जनता आज भी पूरे विश्वास और उसी उत्साह के साथ आगे बढ़ा रही है। मैसूर का दशहरा हो या नागमण्डला का लोकनृत्य जनता की सहभागिता हर उत्सव में रहती है। विशेष बात यह है कि यहां उत्सवों को सामूहिक रूप से मनाने का ही प्रचलन अधिक है।

सेवा परमो धर्मः

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कोरोना काल के दौरान देश भर के धार्मिक संस्थानों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं ने तन-मन-धन से राष्ट्रवासियों की सेवा की। शायद यही कारण था कि भारत में कोरोना का प्रभाव पश्चिमी राष्ट्रों की अपेक्षा कम पड़ा। इस आपदा काल में भारतीय संस्कृति में निहित मानवीय संवेदना का भाव सरकार से लेकर आम आदमी तक प्रवाहित हुआ।

सुरों की यात्रा में संतुष्ट हूं – पद्मश्री पं. उल्हास कशालकर

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अपने गायन में ग्वालियर, आगरा, जयपुर तीनों परिवारों की परम्परा को आगे बढ़ाया और संगीत को एक अलग ऊंचाई पर ले गए। यदि कोई  गायन सुनकर संगीत की समृद्धि का अनुभव करना चाहता है, तो उसे पंडीत उल्हास कशालकर के गायन को अवश्य सुनना चाहिए। पं. उल्हास कशालकर की इस संगीतमय पृष्ठभूमि पर उन्हें मिले पदम्श्री पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार एक बहुत बड़ा और सार्थक सम्मान हैं। आप अपने सुमधुर शास्त्रीय गायन के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय गायन परम्परा में अपना विशिष्ट स्थान बना चुके है।

संस्कृति की लट्ठगाड़ कहाणी (संस्कृति की शौर्यगाथा)

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खेल प्रतियोगिताओं में देश को सबसे ज्यादा मैडल दिलानेवाले राज्य के रूप में प्रसिद्ध हरियाणा की धरती की संस्कृति में शौर्य कूट-कूटकर भरा है। गजब की शारीरिक क्षमता यहां के पुरुषों और महिलाओं की विशेषता है। ठेठ और दूसरों को कडी लगने वाली भाषा बोलने वाले हरियाणवी स्वभाव से उतने ही कोमल और मधुर होते हैं।

संगीत की नई पौध को सींचने वाले गुरु – पं. राजेंद्र वर्मन

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पं. राजेंद्र वर्मन ने सितार वादन की कला को घरानों की परम्परा से बाहर निकालकर नई पीढ़ी की पौध विकसित करने की दिशा में सार्थक प्रयत्न किया है। सवा पांच की ताल के उन्नायक राजेंद्र वर्मन वर्तमान समय के बेहतरीन, संवेदनशील और रचनात्मक कलाकार हैं, जो उनके रागों के गायन में प्रदर्शित होता है। आप अपनी शुद्धता एवं व्यवस्थित विकास और राग की शांति के लिए जाने जाते हैं। हिंदी विवेक को दिए गए साक्षात्कार में उन्होंने संगीत खासकर सितार की बारीकियों और संगीत के भविष्य को लेकर लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत हैं उस साक्षात्कार के सम्पादित अंश:

जीवट संस्कृतिकि बौगदि धारा (जीवट संस्कृति की अविरल धारा)

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उत्तराखंड को देवभूमि यूं ही नहीं कहा जाता है। यह छोटा सा राज्य सनातन संस्कृति के हर आयाम का साक्षी है। यहां का कठोर जीवन भारतीय सेना में इनकी प्रचंड उपस्थिति का भी कारण बनता है। राज्य बनने के बाद यहां बहुत तेजी से विकास कार्य हुआ, जिसमें पिछले 8 वर्षों में काफी तेजी आई है। यहां का साहसिक पर्यटन भी नित नई ऊंचाइयां छू रहा है।

सांस्कृतिक वारसा (सांस्कृतिक विरासत)

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महाराष्ट्र की भक्ति परम्परा और शौर्य गाथाओं ने समूचे राष्ट्र पर अपना प्रभाव स्थापित किया है। निःस्वार्थ राष्ट्रचिंतन महाराष्ट्र की रक्त धमनियों में संस्कृति के तौर पर अनायास प्रवाहित होता है। वर्तमान में भारत का शायद ही कोई राज्य और जिला होगा, जिसके निवासी यहां जीविकोपार्जन के लिए न रह रहे हों।

ब्लैंक चैक

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कहते हैं कि आदमी को कभी बड़े बोल नहीं बोलने चाहिए। ये समय है। इसे परिवर्तनशील कहा जाता है। जाने कब किस करवट बैठ जाय। पर क्या किया जाय, कहावत ये भी है कि जब खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान।

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