तस्माद् योगी भवार्जुन

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कुरुक्षेत्र की युद्धभ्ाूमि। धीरगंभीर आवाज में संदेश दिया गया ‘तस्माद् योगी भवार्जुन’। ५ हजार से भी अधिक वर्ष पूर्व का वह काल। अन्याय-अधर्म के विरुद्ध संघर्ष प्रारंभ करने का निश्चय हुआ है। कौरव (अधर्म)- पांडव (धर्म) की सेनाएं आमने सामने खड़ी हैं, इशारे की प्रतीक्षा में। दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा है एक रथ, सारथी है गोपवंशी योगेश्वर कृष्ण, रथी है महापराक्रमी, राजवंशी वीर, बुद्धिमान अर्जुन।

योग: कर्मसु कौशलं

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     योगेश्वर श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है ‘‘योग: कर्मसु कौशलं।‘‘ अर्थात योग जीवन जीने की कला है। योग कार्य करने का कौशल सिखाती है। योग सत्य को जीवन में उतारने का माध्यम है।

योग विश्‍व स्वास्थ्य की नई इबारत

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      पिछले दिनों समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों में समाज में  हर स्तर पर बढ़ रही हिंसक गतिविधियों ने सभी लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। समाज में आत्महत्याओं की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि समाज मानसिक दृष्टि से स्वस्थ नहीं है।

ओशो प्रवचनों पर आधारित योग के आठ सूत्र

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     पतजलि योग पर ओशो के १०० प्रवचन हैं। इस प्रवचनमाला का नाम है: योगा दि अल्फा एंड ओमेगा। इनके अतिरिक्त, एक और प्रवचनमाला है चेतना का सूर्य, जिसमें, ओशो ने आधुनिक युग को ध्यान में रखकर योग के नए आयामों की वैज्ञानिक चर्चा की है।

योग से ही विश्वशांती संभव है -रमेशभाई ओझा

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योग और अध्यात्म का बहुत गहरा संबंध है। भारतीय जीवन दर्शन और अध्यात्म को अपने प्रवचनों के माध्यम से लोगों तक पहंचाने का कार्य प्रख्यात प्रवचनकार श्री रमेशभाई ओझा जी के द्वारा निरंतर किया जा रहा है। योग के संदर्भ में उनके विचारो को जानने हेतु लिये गये साक्षात्कार के कुछ अंश

पातंजल योग से मन:शांति

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मन की निर्विचार अवस्था साध्य कर पूर्ण निरोध और उससे कैवल्यावस्था साध्य करना मन:शांति की अंतिम अवस्था है। आधुनिक समय में आम आदमी जिस मन:शांति को चाहता है उसका सुयोग्य वर्णन पतंजलि ॠषि ने प्रस्तुत किया है।

योग के प्रभाव

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 पतंजलि ॠषि योगशास्त्र के  साथ साथ व्याकरण, योग, आरोग्य आदि शास्त्रो में भी पारंगत थे। उन्होंने पहला सूत्र बताया है ‘अथयोगानुशासनम्’। इसका अर्थ है मनुष्य का जो शारीरिक, मानसिक र्हास होता है उससे छुटकारा पाने के लिए हमें बचपन से ही योगाभ्यास करने की आवश्यकता है।

ब्रह्मनिष्ठा की साधना का मार्ग

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इस संसार में मनुष्य सर्वाधिक विवेकशील प्राणी है। क्योंकि उसे बुद्धि के साथ ही विवेक भी दिया गया है और वह निरंतर संसार के संबंध में और स्वयं अपने संबंध में भी चिंतन करता है। अन्य प्राणी केवल अपने बारे में, अपनी सुरक्षा, अपने भोजन और अपने विश्राम के बारे में सोचते हैं। हां! वे अपनी संतान की रक्षा के लिए भी तत्पर दिखाई देते हैं।

विश्व शांति का स्रोत ‘योग’

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‘योग’ की भारतीय संकल्पना को ’योगा’ के रूप में मिली वैश्विक प्रसिद्धि इसका सकारात्मक पहलू है परंतु इसे शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित होने से बचाना होगा। भारतीय जीवन दर्शन में निहित ‘योग’ को उसकी सम्पूर्णता के साथ अपनाना ही ‘विश्व योग दिवस’ को सही मायनों में चरितार्थ करना होगा।

योग एवं ध्यान आत्मानंद का मार्ग

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संस्कृत शब्द ‘योग’ युज  धातु से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना, परस्पर जुड़ना या युगल बनना, लैटिन में यही बात यूगर (र्ळीपसशीश) यूगम (र्ळीर्सीा), तथा फे्रंच में जोऊग (र्क्षेीस) शब्द के जरिए व्यक्त होती है। योग का अर्थ है व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा से मिलन। भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश में आज जो आध्यात्मिक परंपराएं व प्रविधियां चल रही हैं, उनकी जड़ें गहरी हैं।

योग : आत्म परिवर्तन का विज्ञान

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       सुख-सुविधाओं तथा भागदौड़ भरी आज की जिंदगी में हम अपनी मानसिक शक्ति और शारीरिक शक्ति से लगभग ३ गुना अधिक परिश्रम करके खुद को निचोड़ रहे हैं। आधुनिकता और प्रतियोगिता के युग में हम स्वयं को अधिक स्वतंत्रता देने का दावा जरूर कर रहे हैं, परंतु स्वतंत्र होने के बजाय अधिक तनावग्रस्त हो रहे हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता का योगशास्त्र

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संयुक्त राष्ट्रसंघ (यूनो) की ओर से इस वर्ष से २१ जून अंतरराष्ट्रीय योगदिनके रूप में मनाने का अभूतपूर्व निर्णय घोषित हुआ। इसी उपलक्ष्य में भगवान के मुखारविंद

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