इतिहास के पाठ्यक्रम में परिवर्तन क्यों आवश्यक

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एक ओर यहूदियों पर किए गए बर्बर अत्याचार के कारण आज जर्मनी में हिटलर का कोई नामलेवा भी नहीं बचा है, पूरा यूरोप एवं अमेरिका ही यहूदियों पर अतीत में हुए अत्याचार के लिए प्रायश्चित-बोध से भरा रहता है, वहीं दूसरी ओर भारत में आज भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्हें गोरी, गज़नी, ख़िलजी, तैमूर जैसे आतताइयों-आक्रांताओं पर गर्व है, उन्हें उनके नाम पर अपने बच्चों के नाम रखने में कोई गुरेज़ नहीं।

ज्ञानवापी में बाबा ही व्याप्त हैं…

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जैसे-जैसे देश की मस्जिदों की खुदाई हो रही है वैसे-वैसे उनके मंदिर होने के साक्ष्य मिल रहे हैं। काशी के ‘कंकर में शंकर है’ की कहावत चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। अयोध्या से शुरू हुआ हिंदुओं के प्रतीकों तथा श्रद्धा स्थानों के पुनर्जागरण का कार्य अब केवल किसी आध्यात्मिक संस्था तक सीमित नहीं रहा, वह जनमानस की आकांक्षा बन चुका है।

स्पष्ट हो अल्पसंख्यक की परिभाषा

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अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की संवैधानिक परिभाषा किसी को ज्ञात न होने के कारण इसके लाभ भी ऐसे समाज को मिल रहे हैं, जो न तो अल्पसंख्यक हैं और न ही उन्हें उससे मिलने वाले लाभों की जरूरत है। इसलिए संविधान में अल्पसंख्यक की परिभाषा स्पष्ट किया जाए ताकि, इसके असली हकदार अल्पसंख्यकों को उचित लाभ मिल सकें।

क्योंकि, खतरे भी हाइटेक हैं

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हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात में मिल रहे अवैध हथियारों से देश में अशांति का वातावरण फैलाने की पूरी तैयारी की जा रही है।

युद्ध के साये में विश्व

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आज जब सारा विश्व एक गांव का स्वरूप ले चुका है तो दो देशों के बीच हो रहे युद्ध का प्रभाव केवल उन देशों तक सीमित रहना असंभव है। वैश्विक भूराजनैतिक तर्क को मानें तो पुतिन उन सभी क्षेत्रों को वापिस पाना चाहते हैं, जो सोवियत के टूटने के बाद रूस से अलग हो गए थे। अगर यह सच है तो इस युद्ध के लंबा खिंचने की सम्भावनाएं बढ़ जाएंगी।

मानव नहीं प्रकृति केंद्रित हो विकास

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आज पूरा विश्व प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से होने वाले पर्यावरण परिवर्तन से परेशान है। इसलिए आवश्यकता है कि वनों के संरक्षण में तेजी लाई जाए तथा ऊर्जा के हानिरहित विकल्पों के शोध को प्राथमिकता दी जाए।

कानून से क्यों छूटा ऑनलाईन जूआ

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ऑनलाइन की दुनिया में अब जूआ, सट्टा भी तकनीकी हो गया है। मटके का नंबर लगाने वाले लोग अब आइपीएल की टीम चुन रहे हैं। लगाया हुआ पैसा कई गुना बढ़कर उन्हें वापिस मिल रहा है, यह बताने वालों की संख्या तो नगण्य है, पर इन लोगों ने सट्टा खिलानेवाली कम्पनियों को मालामाल जरूर कर दिया है।

जिहादी दंगों की नींव में झांककर देखो

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देशभर में रामनवमी और हनुमान जयंती जैसे त्योहारों की शोभायात्रा पर हुई पत्थरबाजी की घटनाएं जिहादी विचारों से प्रेरित हैं। भारतीय मुसलमानों को समझना होगा कि उनका धर्म भले ही इस्लाम है पर देश में रह रहा प्रत्येक व्यक्ति भारतीय संस्कृति का अंग है और उन्हें इसे आत्मसात  करते हुए अलगाववादी मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए।

बांग्लादेशी घुसपैठ का भारत पर परिणाम

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देश के विभिन्न भागों में बढ़ता बांग्लादेशी घुसपैठ न केवल जनसांख्यिकी के औसत के हिसाब से खतरनाक है अपितु घुुसपैठिए बांग्लादेशी नागरिक सामान्य लोगों के आवश्यकता की वस्तुओं की तस्करी  भी कर रहे हैं। इस मामले में व्यापक कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है।

खालिस्तान: विभाजन का वर्तमान हथियार

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वर्तमान में चल रही खालिस्तानी गतिविधियां और उसके प्रति पंजाब की आम आदमी पार्टी का दोहरा रवैया काफी खतरनाक है। ऐसा नहीं है कि पूरा सिख समाज उनके साथ है लेकिन पाकिस्तान और अन्य विदेशी शक्तियों के सहयोग से चल रहे इस आंदोलन पर लगाम लगाए जाने की आवश्यकता है ताकि ये विघटनकारी शक्तियां भविष्य में अलगाववाद के जहर को पूरे सिख समाज तक पहुंचा सकें।

भाजपा का प्रतिद्वंद्वी कौन?

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गुजरात इस साल चुनावी दौर में प्रवेश कर चुका है। राजनीतिक समीकरण साधने के रंग बिखरने लगे हैं, तो सामाजिक समीकरण संवारने के तीर भी तरकश से निकलने लगे हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह वर्तमान में गुजरात के सबसे बड़े राजनीतिक पुत्र हैं। अगले चुनाव में इन्हीं की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा दांव पर होगी।

मुखर विदेश मंत्री व नीति

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नए भारत की विदेश नीति भी नई होगी यह ऐलान तो प्रधान मंत्री पहले ही कर चुके थे। अब उनके ऐलान को वास्तविकता का चोगा पहनाने का काम विदेश मंत्री एस. जयशंकर कर रहे हैं। वे अंतरराष्ट्रीय पटल पर हर देश को उसकी ही भाषा में आंख से आंख मिलाकर जवाब दे रहे हैं।

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