महापुरुष जातियों तक सीमित नहीं होते

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प्रस्तुत लेख रा. स्व. संघ के सहसरकार्यवाह मा. कृष्णगोपालजी द्वारा हिंदी विवेक के ‘राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषांक’ तथा‘सामाजिक न्याय एवं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर’ पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर दिए गए भाषण का शब्दांकन है।

बाबासाहब के तीन सूत्र

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आज समय की मांग है कि डॉ. आंबेडकर के विचारों के अनुरूप हम आगे बढें। उनके विचार केन्द्रस्थान पर हों। हमारा देश विशाल है, विस्तीर्ण है।

महात्मा गांधी और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर

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स्वातंत्र्यपूर्व समय केराजनैतिक-सामाजिक आंदोलनों से स्वातंत्रोत्तर प्रारंभिक समय तक भारत के राजनैतिक-सामाजिक परिवेश पर जिन महापुरुषों का लक्षणीय प्रभाव रहा है, उनकी सूची में महात्मा गांधी और महामानव बाबासाहेब आंबेडकर ये दो अधोरेखांकित नाम हैं।

इतिहास के अत्याचारों केनिशाने पर डॉ. आंबेडकर

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ह म भारत के लोग इतिहास में, इतिहास के अन्वेषण में रुचिअपेक्षाकृत कम ही लेते हैं। शायद भविष्य के प्रति देख सकने की क्षमता पर भी इसका असर पड़ता हो। हमारी इस कमजोरी का लाभ निहित स्वार्थी तत्वों ने दो ढंग से उठाया है। एक तो वे इतिहास को अपनी मनमर्जी की कथा में बदल कर हमारे गले उतारने की

जातिगत आरक्षण और आधुनिकभारतीय ॠषि डॉ. आंबेडकर

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देश मेंे स्वतंत्रता के ६७वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। हमारे देश में रेल, सड़क एवं हवाई सेवाओं में वृद्धि हुई है। इंटरनेट, फेसबुक, व्हाटस्एप, ट्वीटर के इस युग में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का नारा पुष्ट हो रहा है। सारा विश्व ‘ग्लोबल विलेज’ बन गया है। हमारी वर्चुवल गतिशीलता बढ़ी है।

बाबासाहब का ब्राह्मणों केप्रती दृष्टिकोण

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भारत की धरती पर अनेकॠषियों, मुनियो,ं संतोंे, विचाराकों तथा महापुरूषों ने जन्म लिया है। यहां की संस्कृति में जहां एक ओर विचारों की विविधिता रही है; वहीं दूसरी ओर उन्हें प्रकट करने की पूरी स्वतंत्रता भी दी गई है। डॉ. भीमराव आंबे

मजदूरों के हितैषी डॉ. आंबेडकर

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भारत में मजदूर आंदोलनउन्नीसवीं सदी में ही शुरू हो गए थे। सन १८७७ में नागपुर की एम्प्रेस मिल्स के मजदूरों ने हड़ताल की। इसके बाद १८८४ में मुंबई की कपड़ा मिलों के ५००० मजदूरों ने हड़ताल की। सन १९२० में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस बन चुकी थी। सन १९२२ में फैक्ट्रीज एक्ट लागू हुआ जिसके तहत मजदूरों के काम के घंटे १० तय हुए थे।

क्या डॉ. आंबेडकर दलितस्तान चाहते थे?

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“...मैं (डॉ. आंबेडकर) स्पष्ट करता हूं कि जब कभी मेरे एवं राष्ट्र के हितों के बीच टकराव होगा तो मैं अपने व्यक्तिगत हितों की चिंता नहीं करूंगा। परन्तु मेरी अपनी एक प्रतिबद्धता है जिसे मैं नहीं छोड़ सकता। वह प्रतिबद्धता है मेरे अछूत बंधुओं के प्रति।” महज इस कथन के आधार पर यह निहितार्थ निकालना कि डॉ. आंबेडकर दलितस्तान चाहते थे, सही नहीं होगा।

देश की संस्कृति और बाबासाहब

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 बाबासाहब आंबेडकरने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध पंथ अपनाया तब वीर सावरकर ने वक्तव्य दिया - ‘‘आंबेडकर का पंथान्तर, हिंदू धर्म में विश्वासपूर्वक ली गई छलांग है। बौद्ध आंबेडकर, हिंदू आंबेडकर ही हैं। आंबेडकर ने एक अव

बाबासाहब से बोधिसत्व और महात्मा से गांधी

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पिछले लगभग आठ दशकों के राजनैतिक, सामाजिक और शैक्षणिक वातावरण को दो व्यक्तियों ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। पहले महात्मा गांधी जिन्हें भारतीय जनमानस महात्मा कहे बिना व्यक्त नहीं कर पाता है और दूजे बाबासाहब आंबेडकर जिन्हें बोधिसत्व कहे बिना उन्हें पूर्णतः प्रकट ही नहीं किया जा सकता।

डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के विचार चिरकालीन प्रेरणास्रोत

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धन का निस्पृह प्रयोग, वचन का पालन, दूरगामी विचार के साथ उक्ति व कृति, न्याय तथा मानवता की पूजा, इन सब पहलुओ के समेकित प्रयोग से सार्वजनिक जीवन का आध्यात्मिकरण साकार होता है। गोपाल कृष्ण गोखले का भी यही आग्रह था। इस वर्ष उनका जन्मशती वर्ष है, जबकि बाबासाहब का 125वां जयंती वर्ष। दोनों महापुरुषों का अभिवादन!

ज्ञानपिपासु – डॉ. आंबेडकर

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दुनिया के इतिहास मेंकेवल अपने कर्तृत्व से करोड़ों लोगों को दीक्षा देने का, अनुयायी बनाने का और परिवर्तन के जरिए पराक्रम का संदेश देने का काम चुनिंदा लोगों ने ही किया है। अमेरिका में अब्राहम लिंकन, इंग्लैण्ड में विंस्टन चर्चिल जैसे

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