परिवर्तन के शिल्पकार

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अब परिवर्तन की गति भी तेज हो गई है। पहले जहां 10-15-20 सालों में परिवर्तन होते थे, वहीं आज हर दिन कुछ न कुछ नया देखने को मिलता है और अच्छी बात यह है कि अब भारतीय समाज का मानस भी परिवर्तनों को सहज स्वीकार करने का आदी होने लगा है। भारत ने परिवर्तन को स्वीकार करके उसके अनुरूप ढलना तो सीख लिया है। अब इसके आगे उसे स्वयं को परिवर्तित करके दुनिया के परिवर्तन का शिल्पकार बनने की ओर बढ़ना होगा।

संघ एवं मंदिरों का सेवा कार्य

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ये ऐसे लोग हैं जिन्हें मंदिरों में चढ़ावे तो दिखाई पड़ते हैं परन्तु सामाजिक और प्राकृतिक विपदाओं के समय जिस तरह से मंदिरों की ओर से आर्थिक और सामुदायिक सेवा की जाती है वह दिखाई नहीं देती। हमारे यहां मंदिरों को केवल धार्मिक स्थल के रूप में ही नहीं विकसित किया गया है बल्कि वहां नर और नारायण दोनों की सेवा की बातें की जाती हैं।

आपदा में अवसर खोजते मुनाफाखोर

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नकारात्मकता को प्रसारित करने से भी कोविड संकट में लोगों की जान जा रही है। बेहतर होगा कि सरकार की आलोचनाओं से अपना ध्यान हटाकर हमारे मीडिया समूह कालाबाजारी और जमाखोरी करने वाले चेहरों को लक्षित करके बेनकाब करें। एक माहौल इन तत्वों के विरुद्ध खड़ा किया जाए।

वैक्सीनेशन की सुस्त रफ़्तार

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इस परिस्थिति से कैसे निपटा जाये और इसका सबसे सटीक जवाब है सभी का जल्द से जल्द वैक्सीनेशन लेकिन वर्तमान हालत को देखते हुए देश में टीकाकरण की प्रगति संतोषजनक नहीं है, कई राज्यों में वैक्सीन की कमी हैं। कोरोना को रोकने के लिए वैक्सीनेशन है सबसे बड़ा हथियार, लेकिन वैक्सीन की किल्लत चुनौती बन गई है।

जटिल समस्या फलस्तीन-इजराइल संघर्ष

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अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यरूशलम को इजराइल की राजधानी बनाने का खुला समर्थन किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि हम अपने दूतावास को यरूशलम में स्थानांतरित करेंगे। हालांकि जो बाइडेन का वर्तमान प्रशासन उस हद तक इजराइल का समर्थक नहीं है, पर सं.रा. सुरक्षा परिषद में जरूरी हुआ, तो उसके हितों की रक्षा करेगा।

अभूतपूर्व वैश्विक सहायता

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भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों और द्विपक्षीय संबंधों में जिस तरह की भूमिका निभाई है उसका विश्व समुदाय पर सकारात्मक असर है। भारत का सम्मान है और उसके प्रति सद्भावना भी। वास्तव में कठिन समय में हमारी अपनी हैसियत, साख, सम्मान और हमारे प्रति अंतरराष्ट्रीय सद्भावना आसानी से दिखाई देती परंतु उस पर भी यदि एक बड़ी फौज दिन रात नकारात्मकता फैलाने में लगी हो तो इसका भी असर होता ही है।

मन की वैक्सीन

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कोरोना, लॉकडाउन, पहली लहर, दूसरी लहर, तीसरी लहर... पिछले लगभग एक साल से बस यही शब्द सुनाई दे रहे हैं। कोरोना न हुआ मानो रक्तबीज राक्षस हो गया जिसका हर स्ट्रेन पहले से अधिक खतरनाक और संदिग्ध है। अब तो कोरोना के बाद होने वाले ब्लैक फंगस तथा व्हाइट फंगस ने सभी की नींद उडा रखी है। ब्लैक फंगस शरीर के सबसे कमजोर हिस्से पर वार करता है और उसे इतना प्रभावित कर देता है कि वह अंग ही शरीर से अलग करना पडता है।

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