लौहपुरुष की स्वप्नपूर्ति

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सरदार वल्लभभाई पटेल के बिना भारत का एकीकरण असम्भव था। उस समय पूरे विश्व को लगता था कि वह एक असम्भव कार्य था, परंतु उन्होंने उसे सम्भव कर दिखाया। हालांकि आखिरी समय तक सरदार पटेल को एक बात का मलाल रहा कि कश्मीर पूरी तरह भारत का हिस्सा नहीं बन पाया।

शरद पूर्णिमा: एक शाम दोस्तों के नाम

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एक समय था, जब शरद पूर्णिमा के दिन जगह-जगह पूरी रात सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे, इसे युवाओं का त्यौहार माना जाता था। संगीत की महफिल, नाटक का मंचन, कविताओं का पठन, सामूहिक या व्यक्तिगत नृत्य इत्यादि का प्रदर्शन करके देर रात जागरण होता था। लगभग पूरे साल इस त्यौहार की राह देखी जाती थी। आज युवाओं के कार्यक्रम के नाम पर होने वाली फूहड़ रेव पार्टी से यह कहीं ज्यादा सुंदर, मनभावन और अपनी संस्कृति से जुड़ा हुआ है। क्या इसे पुन: वही स्वरूप दिया जा सकता है?

हौसलों की उड़ान

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एक दिन अचानक पुल का एक हिस्सा ढह गया। वह दर्दनाक हादसा अनेक मजदूरों के संग गीतिका के बापू को भी निगल गया। गीतिका की आंखों में क्रोध उतर आया। वह सविता से कहने लगी, मां, ये इंजीनियर, ओवरसीयर, ठेकेदार घूस खाकर खराब माल लेते हैं। न इन्हें मजदूरों का खयाल है, न देश का। कितने मजदूर अपनी जान से हाथ धो बैठे, पर इन बेशर्मों को शर्म कहां है? इनकी तिजोरियां भर गईं। अब करेंगे मजदूरों की लाशों पर अय्याशी।

विज्ञान पर भारी भारतीय जुगाड़

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भारतीय जनमानस के लिए जुगाड़ एक शब्द मात्र ही नहीं जीवन को आसान बनाने का सरलतम उपाय है परंतु सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि इसे मान्यता नहीं मिलती, जिस कारण यह प्रतिभा बहुत जल्दी अपना दम तोड़ देती है। आवश्यक है कि लोगों को तकनीकी तौर पर मजबूत बनाने के प्रयास किए जाएं, ताकि कम खर्चे में होने वाले ये प्रयोग व्यापक आधार पा सकें।

मंदिरों की पूजा की रीति

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सम्पूर्ण भारत में ऐसे-ऐसे दिव्य मंदिर है, जहां की विविधतापूर्ण विशेषताएं विश्व भर के लोगों को आकर्षित करते हैं। साथ ही, देश भर में मनाया जाने वाला नवरात्रि और दशहरे का त्योहार भी हर राज्य में अपनी एक अलग छटा बिखेरता है। नवरात्री का यह त्योहार खास तौर पर भक्ति और शक्ति का प्रतीक है।

भारत में वैचारिक धुंधकाल

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राजनीतिक स्तर पर वामपंथ फलक से गायब होता जा रहा है लेकिन वह अलग-अलग तथा ज्यादा खतरनाक और विध्वंसक तरीके से सामने आ रहा है। समाज को तोड़ने के लिए चलाए जा रहे इनके अभियान इतने सूक्ष्म तरीके से चलाए जा रहे हैं कि आम जन को पता ही नहीं चल पाता कि यह एक वामपंथी नैरेटिव है। इन देश विरोधी गतिविधियों पर रोक लगाया जाना आवश्यक है।

देश के साथ विश्वासघात

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1991 का पूजा स्थल अधिनियम भारत के संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। यह मुस्लिमों के वक्फ बोर्ड को असीमित अधिकार देता है। इसके तहत यदि वक्फ बोर्ड किसी जमीन पर अनाधिकार कब्जा करता है तो उसके लिए उसे कोई प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं होती है, बल्कि पीड़ित पक्ष को साबित करना होता है कि वह सम्पत्ति उसकी है। इस तरह के एकतरफा कानून की समीक्षा होनी चाहिए।

विजयादशमी शस्त्र पूजन की परम्परा

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हमारे यहां शस्त्र पूजन की परम्परा सनातन काल से चली आ रही है परंतु स्वतंत्रता के बाद वामपंथियों ने इसे साम्प्रदायिक रंग देना शुरू कर दिया और आम जन ने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने लगातार अपनी सनातनी परम्पराओं के निर्वहन की कड़ी में इसे जोड़े रखा है। धीरे-धीरे लोगों के मन में पुनर्जागरण के तौर पर दशहरे पर शस्त्र पूजन के प्रति निष्ठा का भाव जाग्रत होता जा रहा है।

किसका पलड़ा भारी?

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गुजरात धीरे-धीरे चुनावी मोड में आ रहा है। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल पंजाब में जीत के बाद सातवें आसमान पर हैं लेकिन गुजरात की खासियत है कि वहां हमेशा से ही राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की बात को महत्व मिलता है। चाहे नेहरू-इंदिरा रहे हों या अटल-अडवाणी। इसलिए हर किसी को पता है कि अंत में किसका पलड़ा भारी रहने वाला है।

वानप्रस्थ की वर्तमान संकल्पना

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रिटायरमेंट के जीवन को लोग बोझ समझने लगते हैं, जबकि उनके अनुभव का उपयोग समाज और राष्ट्रहित में किया जा सकता है। वर्तमान में वानप्रस्थी जीवन जी रहे लोगों के पास लोकसेवा के असीम अवसर उपलब्ध हैं। वे सामाजिक कार्यों में अपने समय का सदुपयोग कर जीवन की नीरसता से भी बच सकते हैं।

दिखावा तन ढंकने से ज्यादा जरूरी है…

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भौतिक जीवन हम सब पर इतना अधिक हावी हो चुका है कि हमने शरीर ढंकने वाले वस्त्रों को भी शानोशौकत की वस्तु बना लिया है। महंगे कपड़े और उनके दुहराव से बचने की प्रवृत्ति बेमतलब का बोझ लाद रही है। आवश्यकता है कि पश्चिम के अनुकरण के नाम पर बहने की बजाय भारतीय परिवेश और मौसम के अनुकूल कपड़ों का चयन करें।

खत लिखने की खत्म होती परम्परा

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चिट्ठियों से होते हुए हम ईमेल तक पहुंच गए हैं लेकिन उसे भुला नहीं पाए हैं। पिछली कितनी ही पीढ़ियों के जीवन में सांस और रक्त की तरह रही थीं चिट्ठियां। लेकिन वर्तमान पीढ़ी उसे भूल चुकी है। उन्हें धैर्य शब्द का मतलब ही नहीं मालूम, जबकि चिट्ठियां धैर्य की परीक्षा लेती हैं।

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