वास्तविक लोकतंत्र के लिए वैकल्पिक पत्रकारिता

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राजतंत्र में भी लोकतंत्र की यह व्यवस्था हज़ारों वर्षों के प्रयोग व विमर्श का परिणाम थी। पश्चिम के प्रभाव में हमने स्वतंत्र होने पर डेमोक्रेसी को अपनाया और लोकतंत्र या प्रजातंत्र को भुला दिया। लोक का मन जानने के लिए पत्रकारिता एक सशक्त माध्यम हो सकता है। पत्रकारिता समाज की ऐसी रचना है जिसमें कुछ इस कार्य में दक्ष नागरिकों को दायित्व दिया जाता है कि वे लोक व प्रशासन में सेतु का कार्य करें। 

आजादी का 75वां वर्ष न्याय-व्यवस्था की दिशा व दशा

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भारत की न्यायपालिका की संवेदना भारत के जनमानस के साथ जुड़ी दिखाई नहीं देती। उसका अपना एक सामंती चरित्र है, जो हर प्रकार से शक्तियों से परिपूर्ण किन्तु किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है और बड़ी आत्ममुग्ध और स्व-संचालित है। वह अपने बारें में किसी समीक्षा को पसंद नहीं करता। 

संविधान, लोकतंत्र और अमृत महोत्सव

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निश्चित रूप से दुनिया में हमारी साख के पीछे हमारा मजबूत संविधान और विश्व का सबसे बड़ा एवं सशक्त लोकतंत्र ही हैं, जो दुनिया के लिए आश्चर्य, विश्वास के साथ स्वीकार्यता की कसौटी पर खरा उतर कर भारत को विश्व गुरू की ओर अग्रसर कर रहा है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की छाया में गणतंत्र

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बदलाव की चेतना स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी देखने में आई थी। इसीलिए इसे भारतीय स्वाभिमान की जागृति का संग्राम भी कहा जाता है। राजनीतिक दमन और आर्थिक शोषण के विरुद्ध लोक-चेतना का यह प्रबुद्ध अभियान था। यह चेतना उत्तरोतर ऐसी विस्तृत हुई कि समूची दुनिया में उपनिवेशवाद के विरुद्ध मुक्ति का स्वर मुखर हो गया। परिणाम स्वरूप भारत की आजादी एशिया और अफ्रीका की भी आजादी लेकर आई।

गौशाला-पांजरापोल की आधुनिक आदर्श व्यवस्था

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 अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि गोशाला-पांजरापोल की आधुनिक आदर्श व्यवस्था कैसे की जाए और उन्हें स्वावलंबी व आत्मनिर्भर कैसे बनाया जाए? जिससे उन्हें गोशाला संचालन में आसानी हो और सहजता से वह गोसेवा कर पाए। जिसमें सभी प्रकार की अत्याधुनिक सुख सुविधा भी मौजूद हो।

अपराधियों का महिमा मंडन कब तक

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  सुशांत सिंह राजपूत के मामले में एक तथाकथित बड़े चैनल ने मुख्य आरोपी को बैठाकर हास्यास्पद सवाल पूछे। कुछ ही दिन पहले दिल्ली दंगे के मुख्य आरोपियों में से एक को उसी टीवी चैनल ने स्थान दिया था। यही नहीं इसी टीवी चैनल ने कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा मारे गए एक आतंकवादी के बारे में बताया था कि वह गणित का शिक्षक था। और भी कई घटनाएं बताकर उसके आतंकवादी होने के गुनाह पर लीपापोती करने का प्रयास किया। 

वाराणस्यां तु विश्वेशं

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  आनन्द कानन या आनन्द वन के नाम से संबोधित किए जानेवाले मानव सभ्यता के प्राचीनतम नगर काशी के सबसे महत्वपूर्ण धर्म स्थलों में से एक काशी विश्वनाथ धाम आज सम्पूर्ण विश्व के सनातन हिंदुओं के लिए परमानन्द का कारण बन गया है।

सरकारी नियंत्रण से कब मुक्त होंगे मंदिर?

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देश के साधु संतों ने अब इस कमान को संभाल लिया है तो हमें विश्वास है कि हिन्दुओं के आस्था केन्द्र मंदिरों पर से सरकारी नियंत्रण से मुक्ति मिलेगी और इसका आगाज उत्तराखंड की सरकार के इस आदेश से हो गया है कि राज्य के चारों धाम में आने वाले मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाता है। 

फंडिंग एजेन्सी के हाथों में आंदोलन

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इस तरह एनजीओ में धीरे-धीरे फंडिंग एजेन्सी का दबाव अधिक बढ़ने लगा और आंदोलन समाज के हाथ से निकल गया। वर्ना देश में कोई भी आंदोलन समाज से कट कर कैसे चल सकता है? जैसे दिल्ली में हाल में ही सीएए और एनआरसी के खिलाफ आंदोलन चला। जिसकी वजह से लाखों लोगों की जिन्दगी प्रभावित हुई। स्कूल बस, एम्बुलेन्स तक को शाहीन बाग आंदोलन में बाधित किया गया। क्या महीनों ऐसे रास्ता बंद करके बैठे लोगों के समूह को आंदोलन कह सकते हैं, जिस आंदोलन में कोई मानवीय पक्ष दिखाई ना देता हो। 

कोरोना वायरस का चिंताजनक वैरिएंट ओमीक्रॉन

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इस ओमीक्रॉन वैरिऐंट में बड़ी संख्या में म्युटेशंस हैं जो किसी संक्रमण अथवा टीकाकरण के उपरांत विकसित उदासीनकारी यानी न्यूट्रलाइज़िंग एंटीबॉडीज़ और चिकित्सीय मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ का विरोध कर सकते हैं। इसके स्पाइक प्रोटीन के विभेदन स्थल के आस- पास भी म्यूटेशन के समूह देखे जाते हैं। यह स्पाइक प्रोटीन वायरस को कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है। कोरोना वायरस जितनी आसानी से कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं उतनी ही तेजी से उनका उत्पादन भी होता है और उनकी संचारक क्षमता भी बढ़ जाती है।

पंजाब का चुनावी गणित

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इधर भाजपा में आए दिन किसी न किसी महत्वपूर्ण सिख नेता का आगमन हो रहा है। पहले ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के महत्वपूर्ण पदाधिकारी मनजिंदर सिंह सिरसा भाजपा के हो चुके है। वही अब हरभजन और युवराज सिंह के आने की चर्चा फिजाओं मे तैर रही है किंतु पिछले चुनावों में कुल जमा दों सीट वाले भाजपा के लिए पंजाब अभी भी दूर की कौड़ी नजर आ रही है।

लोकतांत्रिक चेहरों पर एकशाही की मासूमियत

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लोकतंत्र का शिखर तलहटी को थोड़ा-थोड़ी सरकाता रहता है। न बर्फ खिसके, न वोट बैंक। परिवार उठता चला जाए। साधारण सीं झोंपड़ी से निकलकर हजारों करोड़ की मिलकियत कैसे बन जाती है! पर चेहरे पर जनवाद लहलहाता है।   

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